नाटक साहित्य की अत्यंत प्राचीन विधा है। संस्कृत साहित्य में इसे रुपक के नाम से जाना जाता है। वस्तुतः नाटक एक दृश्य प्रधान रचना है जिसकी सफलता का परीक्षण रंगमंच पर होता है। रंगमंच के बिना नाटक एक अधूरी वस्तु जान पड़ती है। हालांकि रंगमंच युग विशेष की जनरूचि और तत्कालीन आर्थिक व्यवस्था पर निर्भर करता है, यही कारण है कि समय के साथ-साथ नाटक के स्वरुप तथा उसकी संरचना में परिवर्तन देखने को मिलता है। यहां हम इन्हीं नाट्य संवेदनाओं को आधार बनाकर नागमंडल नाटक के तत्वों की समीक्षा करेंगे।
नागमंडल सुप्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त नाटककार गिरीश कर्नाड द्वारा रचित एक कन्नड नाटक है। इस नाटक में न केवल एक बल्कि दो-दो, तीन-तीन कथाएं एक दूसरे के समांतर चलती हैं जिसकी विस्तृत चर्चा हम नाटक के कथावस्तु के संदर्भ में करेंगे। किसी भी नाटक का मूल आधार उसकी कथावस्तु होती है। जिसके आधार पर संपूर्ण नाटक का खाका खींचा जा सकता है। नागमंडल नाटक की कथावस्तु संक्षिप्त में इस प्रकार है- जैसा कि पहले ही बताया जा चुका है कि इस नाटक की पृष्ठभूमि लोककथाओं पर आधारित है जो कि एक लोक प्रचलित मिथक से प्रभावित है। हम देखते हैं कि प्राचीन भारत अख्यानकों और दंतकथाओं आदि में इच्छाधारी नाग की कपोल-कल्पनाएं बहुत ही लोकप्रिय रही हैं। नागमंडल नाटक का आरंभ एक उजड़े हुए मंदिर से होता है।जहां एक मनुष्य भागते हुए आ पहुंचा है। वह काफी घबराया हुआ है क्योंकि उसे श्राप मिला है कि उसे महीने में कम से कम एक दिन पूरी तरह जागरण करना है नहीं तो वह महीने के अंतिम दिन मर जाएगा। उस मंदिर में कई ज्योतियां शाम के समय इकट्ठा होती हैं। वह मनुष्य को कथा सुनाती हैं, जिससे कि वह रात भर जगा रह सके। कथा इस प्रकार है, एक लड़की जिसका नाम रानी है उसकी शादी अप्पण्णा नामक एक व्यक्ति से होती है। अप्पण्णा अपनी पत्नी को जरा भी नहीं चाहता क्योंकि वह किसी दूसरी स्त्री पर आसक्त है। वह जब भी घर से बाहर जाता है, घर पर बाहर से ताला लगा देता है। ताकि रानी बाहरी दुनिया से न मिल सके। अप्पण्णा की एक मौसी जो नाटक में अंधी मां की भूमिका में है वह भी उसी गांव में रहती है। एक दिन वह रानी को कोई जड़ी-बूटी देती है।जिसको कि दूध में मिलाकर पिलाने से अप्पण्णा रानी के करीब आ जाएगा। लेकिन रानी भय के कारण जड़ी मिले दूध को एक नाग के बिल में डाल देती है। जिससे वह नाग रानी के प्रति आसक्त हो जाता है तथा अप्पण्णा के बाहर चले जाने पर वह उसका रूप धारण कर रानी के साथ संबंध स्थापित करता है। जिसके फलस्वरूप रानी गर्भवती हो जाती है। इधर अप्पण्णा को जब इस बात की ख़बर होती है तो वह रानी के ऊपर चारित्रिक दोषारोपण करता है। जिसके बाद रानी भरी पंचायत में नाग को हाथ में लेकर सत्य करती है और कहती है- “मेरा पति और यह नागराज इन दो के अलावा मैंने किसी और को छुआ तक नहीं। किसी भी पुरुष को मैंने अपना शरीर छूने नहीं दिया यह झूठ हो तो यह नागराज मुझे डस ले और मैं यही मर जाऊं” इतना कहते ही नागराज अपने बॉबी में चला जाता है और लोग करिश्मा-करिश्मा चमत्कार-चमत्कार कह कर चिल्लाने लगते हैं। फिर उसका पति भी उसे देवी मान स्वीकार कर लेता है। इस प्रकार देखें तो नागमंडल की कहानी अत्यंत रोचक तथा सुगठित है। इसमें शुरू से लेकर अंत तक रोचकता बनी रहती है कि ‘ अब आगे क्या होगा?’ इस प्रकार हम देखें तो गिरीश कर्नाड ने एक कल्पित कथा को लोक से उठाकर रंगमंच तक लाने का जो कार्य किया है वह अत्यंत उल्लेखनीय तथा स्मरणीय है।
किसी नाटक की सफलता बहुत हद तक उसकी पात्र योजना पर निर्भर करती है। पात्र ही कथावस्तु को लेकर आगे बढ़ते हैं। नाटक रंगमंच पर इन्हीं पात्रों के माध्यम से दर्शक तक पहुंचता है। पात्र योजना की दृष्टि से नागमंडल बहुत सीमा तक सफल माना जा सकता है हालांकि इस नाटक में कुछ पात्र अनावश्यक लगते हैं, जिनके बिना भी नाटक को आगे बढ़ाया जा सकता था। मेरे ख्याल से इतनी ज्योतियों की उपस्थिति जरूरी नहीं लगती है। कहानी सुनाने का काम एक या दो ज्योतियों के माध्यम से भी हो सकता था। दूसरा अप्पण्णा की भूमिका एक अच्छे बेटे तक तो ठीक लगती है लेकिन उसका अचानक गायब हो जाना कहानी पर कोई खास असर नहीं डालता। रही बात अंधी मां को पीठ पर लादकर चलाने की तो वह अपने सहारे चल सकती थी जो कि कप्पण्णा के चले जाने पर होता भी है। शायद कप्पण्णा के बिना भी कहानी बढ़ सकती थी। नाटक के अन्य पात्र अपनी भूमिका के साथ पूरा न्याय करते नजर आते हैं। नाटक की कथावस्तु को ध्यान में रखे तो नागराज ही इसका नायक समझ आता है। अप्पण्णा की कल्पना खल चरित्र के रूप में हुई है। लेकिन कहानी के खत्म होते-होते उसका भी ह्रदय परिवर्तन हो जाता है। रानी की भूमिका नाटक की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी दिखाई पड़ती है। जिसके इर्द-गिर्द ही पूरा नाटक घूमता हुआ नजर आता है। इस प्रकार देखें तो कुछ एक छोटी गलतियों के बावजूद पात्र एवं चरित्र चित्रण की दृष्टि से नागमंडल एक सफल नाटक कहा जा सकता है।
संवाद हमेशा कथानक तथा पात्रों के अनुकूल होना चाहिए क्योंकि संवाद नाटक की सफलता में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। संवाद छोटे होने चाहिए या बड़े इसका निश्चित मानक तो नहीं है लेकिन रंगमंच पर अक्सर छोटे संवाद अधिक प्रभावशाली सिद्ध होते हैं। हालांकि एक यह पक्ष भी है कि साहित्यिक नाटकों में कई बार किसी दार्शनिक के विचार या गंभीर बात कहने की लिए बड़े-बड़े संवाद आवश्यक होते हैं। चूंकि नागमंडल एक किस्सागोई के रूप में प्रस्तुत हुआ है। इसलिए इस नाटक के आरंभिक कुछ संवाद बहुत बड़े-बड़े बने हैं हालांकि फिर धीरे-धीरे संवाद सामान्य श्रेणी (आकार में) के होते गए हैं।कहीं-कहीं संवाद बेहद नाजुक, उल्लासमय तथा रोमांटिक बन पड़े हैं। एक उदाहरण देखिए जब रानी अप्पण्णा से कहती है,
”(चिढ़कर) बंद ही रखी अपना मुंह,कहे देती हूं मैं आपकी पत्नी हूं आप मेरे साथ जैसा भी सलूक करें कोई पूछने ताछने वाला नहीं है पर आपका मेरे मां-बाप के बारे में ऐसी बातें करना मैं बर्दाश्त नहीं कर सकती।धत्त यह कुत्ता भी…”।
इस प्रकार नाटक के संवाद अत्यंत प्रभावशाली सरल,सहज एवं स्वाभाविक हैं जो कथानक को गति प्रदान करते हैं।
नाटक लिखे ही इसलिए जाते हैं ताकि उनका मंचन किया जा सके तथा इसके लिए देशकाल तथा वातावरण का ध्यान रखा जाना अत्यंत आवश्यक है। नागमंडल लोककथा पर आधारित नाटक है इसलिए इसमें लोकरंग के तत्व भरपूर मात्रा में देखने को मिलते हैं। साथ ही इसमें मिथक की पद्धति का भी खास ख्याल रखा गया है। इसके अतिरिक्त इस नाटक की जो सबसे विशेष बात है, वह यह है कि इस नाटक की पृष्ठभूमि भले ही मिथकीय कथा जुड़ी है परंतु लेखक ने इसमें नारी शोषण के विरुद्ध भी मजबूत पक्ष रखा है।
किसी भी नाटक के सफल होने का परम आवश्यक तत्व है उसमें अभिनेयता का गुण। कोई भी नाटक तब तक अधूरा माना जाता है जब तक उसका मंचन नहीं हो जाता। असल मायने में नाटक रंगमंच पर ही पूरा होता है। इस हिसाब से नागमंडल नाटक बहुत अधिक सफल माना जाएगा। नाटककार ने मंचन को आसान बनाने की लिए जगह-जगह रंग संकेत दिए हैं। लेखक ने रंग-सज्जा और क्रिया व्यापार के आवश्यक संकेत भी दिए हैं। परन्तु इसके बावजूद कुछ कमियां भी मुझे नज़र आती हैं, जैसे संवाद का काफी बड़ा होना। एक आध दृश्य जिनका रंगमंच पर मंचन बहुत ही कठिन दिखता है, जैसे नाग का मनुष्य में परिवर्तन, ज्योतियों का बोल पाना, अंधी मां को लादकर चलना। हालांकि आज रंगमंच अत्यंत विकसित अवस्था में हैं तो इस प्रकार की समस्या को बहुत हद तक हल किया जा सकता है। इस प्रकार हम देखें तो कुछ कमियों को छोड़कर यह नाटक मंच पर पूरी तरह सफल नजर आता है। जो कमियां हैं भी वह बहुत सीमा तक रंग निर्देशक तथा अभिनेता की कुशलता द्वारा कम की जा सकती हैं। न केवल नाटक अपितु किसी भी कृति की अंतिम सफलता उसकी उद्देश्य प्राप्ति में निहित होती है। इस मानक पर हम इसे देखते हैं तो नागमंगल नाटक बहुत हद तक सफल लगता है, मुझे तो लगता ही है। इसके कई कारण हैं-पहला, नाटक लोक तत्वों को लेकर आगे बढ़ता है और बहुत सीमा तक वह लोकरंगों से नाटक को रंगीन बनाए रखता है। दूसरा,यह कि इस नाटक के माध्यम से नाटककार ने स्त्री-पुरुष के दांपत्य जीवन की जिस सच्चाई का उद्घाटन किया है वह वाकई काबिले तारीफ है। तीसरा, नाटक लोक तथा मिथक पर आधारित है लेकिन इसमें नारी शोषण के विरुद्ध में जो आवाज बुलंद की गई है। उसे किसी प्रकार से कमतर नहीं माना जा सकता। चौथा और आखिरी यह कि किसी भी नाटक की रचना के पीछे जो सबसे बड़ा लक्ष्य होता है दर्शक या सामाजिक का मनोरंजन। इस कसौटी पर तो यह नाटक सौ फ़ीसदी खरा उतरता नजर आता है।’ अब क्या होगा?’ वाली जिज्ञासा शुरू से अंतिम तक बनी रहती है जो किसी भी कृति की सफलता का सबसे बड़ा मानक है और नागमंडल इसमें सफल है। नाटक तत्वों के आधार पर नागमंडल की विवेचना करने की उपरांत हम कह सकते हैं कि यह नाटक भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण कृति है। जिसे गिरीश कर्नाड ने बेहद ही खूबसूरत तथा तर्कसंगत ढंग से प्रस्तुत किया है। यह नाटक कल्पना, मिथक तथा लोक तत्वों के माध्यम से समाज की हकीकत बयां कर रहा है। अंत में निष्कर्ष रूप में हम सौ बात की एक बात यही कह सकते हैं कि गिरीश कर्नाड का यह नाटक अपने कथानक, पात्र-योजना,संवाद, अभिनेयता तथा उद्देश्य आदि हर दृष्टियों से एक सफल नाटक है जो भारतीय साहित्य के विकास में एक प्रस्थान स्थापित करता है।
स्रोत:
- नागमंडल (हिन्दी संस्करण), गिरीश कर्नाड, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली