ISSN NO: 2581-8074 मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान की अन्तर्राष्ट्रीय शोध पत्रिका (Multidisciplinary) Peer Reviewed Journal

ईश्वर काका

निशा सहगल
कहानी

कार का हॉर्न बजा। किसी ने ड्राइविंग सीट से मुंह निकालकर आवाज लगाई, “अरे चौकीदार, दरवाजा खोलना।”

मैंने आराम से उठकर दरवाजा खोला। एक कार भीतर आकर सीधे पार्किंग में जाकर रुकी। मैं धीरे-धीरे चलता हुआ उनकी ओर बढ़ा। कार में से एक युवक और युवती निकले और पीछे की सीट से एक बूढ़ी माता। युवक कुछ बोलता, इसके पहले ही मैंने कहा, “वृद्धाश्रम में आपका स्वागत है, ऑफिस उस तरफ है।”

मैंने गहरी नजरों से तीनों को देखा। यह एक आम नजारा था इस वृद्धाश्रम के लिए। कोई अपना ही अपनों को छोड़ने यहां आता था। सभी चुप थे, पर लड़के के चेहरे पर उदासी भरी चुप्पी थी। लड़की के चेहरे पर गुस्से से भरी चुप्पी थी और बूढ़ी अम्मा के चेहरे पर एक खालीपन की चुप्पी थी। मैं इस चुप्पी को पहचानता था। यह दुनिया की सबसे भयानक चुप्पी होती है। खालीपन का अहसास, सब कुछ होते हुए भी डरावना होता है और अंततः यही अहसास इंसान को मार देता है।

तीनों धीरे-धीरे मेरे संग ऑफिस की ओर चल दिए। मैं बूढ़ी अम्मा को देख रहा था। बहुत थकी हुई लग रही थी, उसके हाथ कांप रहे थे। उससे ठीक से चला भी नहीं जा रहा था। अचानक चलते चलते वो लड़खड़ाई तो मैंने उसे झट से सहारा दिया। लड़के ने खामोशी से मेरी ओर देखा। मैंने बूढ़ी अम्मा को सांत्वना दी।

“ठीक है अम्मा। धीरे चलिए, कोई बात नहीं। बस आपका नया घर थोड़ी दूर ही है।”

मेरे ये शब्द सुनकर सब रुक से गए। युवती के चेहरे का गुस्सा कुछ और तेज हुआ। लड़के के चेहरे पर कुछ और उदासी फैली और बूढ़ी मां के आंखों से आंसू छलक पड़े। युवती गुर्राकर बोली, “तुम्हें ज्यादा बोलना आता है क्या? चौकीदार हो, चौकीदार ही रहो।”

मैंने ऐसे दुनियादार लोग बहुत देखे थे और वैसे भी मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता था। मैं इन जमीनी बातों से बहुत ऊपर आ चुका था। मैंने कहा, “बीबीजी, मैंने कोई गलत बात तो नहीं कही, अब इनका घर तो यही है।”

युवती गुस्से से चिल्लाई, “हमें मत समझाओ कि क्या है और क्या नहीं।”

युवक ने उसे शांत रहने को कहा। बूढ़ी अम्मा के चेहरे पर आंसू अब बहती लकीर बन गए थे।

शोर सुनकर ऑफिस से भारद्वाज और शान्ति दीदी बाहर आये। उन्होंने पूछा, “क्या बात है ईश्वर, किस बात का शोर है?”

मैंने ने ठहरकर कहा, “जी, कोई बात नहीं, बस ये आये हैं। बूढ़ी अम्मा को लेकर।”

युवती फिर भड़क कर बोली, “तुम जैसे छोटे लोगों के मुंह नहीं लगना चाहिए।”

भारद्वाज जी सारा मामला समझ गए। उन्होंने शांत स्वर में कहा, “मैडम जी, यहां कोई छोटा नहीं है और न ही प्रसिद्ध कोई बड़ा। यह एक घर है, जहां सभी एक समान रहते हैं और मुझे बड़ी खुशी होती अगर ऐसा ही घर समाज के हर हिस्से में भी रहता।”

युवती कसमसाकर चुप हो गयी। युवक ने सभी को भीतर चलने को कहा। जाते-जाते बूढ़ी अम्मा ने मुझे पलटकर देखा। मैंने उसे आंखों ही आंखों में एक अपनत्व भरी सांत्वना दी।

ऑफिस में मैंने बूढ़ी माता के लिए कुर्सी लाकर रख दी। मैं उन सभी को और इस फानी दुनिया के खत्म होते रिश्तों को देखते हुए खुद दरवाजे के पास खड़ा रहा। थोड़ी देर की चुप्पी के बाद युवक धीरे से बोला, “भारद्वाज जी, आपसे कल बात हुई थी, मैं सुमित हूं, यह मेरी मां है। इनके बारे में आपसे बात की थी।” इतना बोलने के बाद वो चुप हो गया। वो असहज सा था। उसका गला रुक-रुक जाता था। मैंने अपने लम्बे जीवन में यह सब बहुत देखा था। मैंने युवती की ओर देखा। वो अभी भी गुस्से में ही थी। बूढ़ी अम्मा अपने बेटे की ओर देख रही थी, इस आशा में कि अब जो होने वाला है, वो नहीं होगा और वो फिर वापिस चल देंगे। लेकिन मैं जानता था, यह नहीं होने वाला था।

मैंने चुपचाप अलमारी से रजिस्टर और रसीद बुक निकाल कर भारद्वाज जी के सामने रख दिया। भारद्वाज जी ने सुमित को वृद्धाश्रम के खर्चे के बारे में बताया। सुमित ने चुपचाप अपने पर्स से रुपये निकालकर दे दिये और जरुरी कागजात पर हस्ताक्षर कर दिए।

बूढ़ी अम्मा की आंखों से आंसू बहे जा रहे थे। वो अब भी अपने बेटे को देखी जा रही थी। भारद्वाज जी ने धीरे से कहा, “अब सब ठीक है जी।” यह सुनते ही युवती उठकर खड़ी हो गयी चलने के लिए। बूढ़ी अम्मा ने अपने आंसू पोंछ दिए और युवती से कहा, “बहू, सुमित का ख्याल रखना।” युवती ने कोई जवाब नहीं दिया और बाहर की ओर चल दी। युवक बैठा रहा चुपचाप। फिर उसकी आंखों में से भी आंसू टपक पड़े। बूढ़ी अम्मा ने कहा, “जाने दे बेटा। सब ठीक है। यहां ये सब मेरा ख्याल रखेंगे। तू अपना ख्याल रखना, समय पर खाना खा लिया करना।”

युवक, बूढ़ी औरत के पैरों पर गिर पड़ा और रोने लगा, “मां मुझे माफ कर दे।”

मां बेचारी क्या करती। वो तो है ही ममता की मूरत। उसने उसे उठाया और कहा, “सुमित, कोई बात नहीं मेरे बच्चे, चलो अपना घर बार संभालो, मेरा क्या है, आज हूं, कल नहीं। तू जा। हां, अब कभी मुझसे मिलने मत आना।”

युवक अवाक सा चुप खड़ा रहा। यह खामोशी विदाई की थी। यह खामोशी रिश्तों के टूटने की थी। यह खामोशी इंसान की इंसानियत के मरने की भी थी। इतने में दो आवाजें एक साथ आई। उस युवती की, जो बाहर से चिल्ला रही थी, “अब चलो भी, यहीं नहीं रहना है मुझे” और दूसरी आवाज शान्ति की थी, जिसने बूढ़ी अम्मा को सहारा देकर अन्दर चलने के लिए कहा था।

युवक चुपचाप हार और बेचारगी को अपने चेहरे पर लिए बाहर की ओर चल दिया। बाहर जाते हुए उसने मुझे कुछ रुपये देने चाहे और कहा, “चौकीदार भैया, मां का ख्याल रखना।” मैंने उसके पैसे वापिस लौटाते हुए कहा, “मां का ख्याल तो हम रख लेंगे सुमित बाबू। आप सोचो, आपका मां जैसा ख्याल अब कौन रखेगा और यहां पैसे नहीं प्यार का सौदा होता है।” युवक खामोशी से मुझे देखता रह गया।

युवक-युवती कार की ओर चल दिये, बूढ़ी अम्मा शान्ति दीदी के साथ भीतर की ओर चल दी। भारद्वाज जी मुझे देखते हुए अलमारी की ओर चल दिए और मैं फिर से अपनी जगह गेट पर चल दिया।

मेरे लिए यह कहानी लगभग हर महीने की थी। जब कोई न कोई किसी न किसी अपने को यहां छोड़ जाता है। आज की गाथा थोड़ी अलग सी थी। लड़का जिंदगी के पेशोपेश में था, पर कायर था। मैंने मन ही मन गिनती की, अब यहां पचपन लोग हो गए थे। ये वो बूढ़े थे, जिनमें से किसी का कोई नहीं था, इसीलिए वो यहां थे और किसी का हर कोई होते हुए भी यहां था। कोई गरीब था, कोई अमीर था, पर एक बात सब में एक समान थी, वो यह कि सब के सब इस जगह पर अकेले ही बन कर आये और यहां आकर एक दूसरे से मानसिक और भावनात्मक रूप से जुड़ गए। यहां की बात कुछ और है। यहां सबको एक अपनापन मिलता है। घर से अलग होकर भी यहां घर जैसा प्रेम और अपनत्व मिलता है।

मेरा नाम ईश्वर था। पता नहीं मेरी मां ने क्या सोच कर मेरा नाम इतना अच्छा रखा था। जब मैं बीस बरस का था, तब मैं अपनी मां के साथ अपना गांव छोड़कर यहां आया था, तब यह एक छोटा सा हॉस्पिटल था। डॉक्टर कुन्दनलाल नामक सज्जन इस जगह के मालिक थे। इस हॉस्पिटल में मां का इलाज होने लगा और फिर मुझे भी कहीं नौकरी चाहिए थी सो मैं इस हॉस्पिटल का वार्ड बॉय के साथ-साथ चौकीदार और सारे बचे हुए काम करने वाला बन गया था। मां का बहुत इलाज हुआ, उसे टी.बी. थी पर वो बच नहीं सकी। करीब एक साल के बाद वो चल बसी। अब मेरा इस दुनिया में कोई नहीं था, सो मैं यहीं का होकर रह गया। धीरे-धीरे कुन्दनलाल जी का मैं विश्वसनीय बन गया। हॉस्पिटल बड़ा होने लगा, लोग आने लगे। कुन्दनलाल जी का यहां कोई न था जो यहां रह सके। एक अकेला बेटा गौतम था जो कि डॉक्टर बनने की चाह में चंडीगढ़ में एम.बी.बी.एस. कर रहा था। यह उसका आखिरी साल था। कुन्दनलाल जी चाहते थे कि वो यहीं इसी जनता हॉस्पिटल में आकर काम करे, लेकिन उसके इरादे कुछ और थे। वो आगे की पढ़ाई के लिए लन्दन जाना चाहता था और इसी बात पर अक्सर दोनों पिता पुत्र में तेज बातचीत हो जाती थी।

हॉस्पिटल बढ़ रहा था, सस्ता हॉस्पिटल होने की वज़ह से बहुत से गरीब यहां आते थे। कुन्दनलाल जी की पुश्तैनी संपत्ति से यह हॉस्पिटल चल रहा था। मैं हॉस्पिटल का हर काम कर लेता था। सब मुझे पसंद भी करते थे। मैं मेहनती था और मां के गुजरने के बाद हर किसी की सेवा करता था। सभी इसी सेवाभाव से खुश थे। कुन्दनलाल जी मेरा ख्याल रखते थे। मैं उन्हीं के साथ उन्हीं के घर पर रहता था। एक दिन उनके मित्र भारद्वाज जी उनसे मिलने आये। दोनों बहुत सालों के बाद मिले थे। मैंने उनके लिए खाना बनाया। खाने के दौरान भारद्वाज जी ने कुन्दनलाल जी से कहा कि उनकी बहू उनसे ठीक बर्ताव नहीं करती है और वो बहुत दुखी हैं। कुन्दनलाल जी ने बिना सोचे कहा कि वो यहीं आकर रहें और उनके साथ इस हॉस्पिटल की देखभाल करें। भारद्वाज जी को जैसे मन चाहा वरदान मिल गया। वो यहीं रह गए। कुन्दनलाल जी का घर बहुत बड़ा था। मैं उनके लिए खाना बनाता, घर का रखरखाव करता और वहीं रहता। दोपहर में हॉस्पिटल के छोटे-बड़े काम करता। बस जिंदगी कट रही थी। यह हॉस्पिटल एक बहुत बड़े परिवार का अहसास दिलाता रहता था।

मेरे मन में कभी शादी करने का ख्याल भी नहीं आया। काम इतना रहता था कि किन्हीं और बातों के लिए समय ही नहीं मिल पाता था। इतने सारे लोगों की सेवा में मुझे बहुत खुशी मिलती, बदले में मुझे आशीर्वाद और प्रेम ही मिलता। सब ने मुझे हमेशा अपना ही समझा।

समय बीतने के साथ भारद्वाज जी ने उस हॉस्पिटल के पिछले हिस्से में एक वृद्धाश्रम खोला। वहां उन बूढ़े व्यक्तियों के रहने की व्यवस्था की गयी थी, जिनका सबकुछ होकर भी, कहीं कोई नहीं था, कहीं कुछ नहीं था। मैंने धीरे-धीरे ये हिस्सा संभालना सीख लिया। मेरे विनम्र और दयालु स्वभाव की वजह से सब मुझे अपना ही मानने लगे।

एक दिन भारद्वाज का लड़का आया अपनी पत्नी के साथ, जायदाद मांगने के लिए। खूब हंगामा हुआ, भारद्वाज जी ने गुस्से में सारी जायदाद इस वृद्धाश्रम के नाम लिख दी और उसी वक्त से अपने बेटे और बहू से रिश्ता तोड़ लिया। मैं अवाक था। मैंने अक्सर यहां एक घर को टूटते और दूसरे घर को बनते देखा है।

कुन्दनलाल जी, भारद्वाज जी और मैं, दीन-दुखियों की सेवा में ही अपना सारा सुख ढूंढ़ते थे। अपनी पढ़ाई पूरी करके कुन्दनलाल जी का लड़का लन्दन जाने की तैयारी के साथ आया और कुन्दनलाल जी को अपना फैसला सुना दिया। कुन्दनलाल जी ने कहा, “ठीक है पढ़ाई पूरी करके वापिस आ जाओ और यह हॉस्पिटल संभालो।” लड़के ने मना कर दिया। लड़के ने खुले रूप से कहा कि वो इन गरीबों के लिए नहीं बना है और न ही वो कभी यहां आना चाहेगा। उसने पिता जी से कहा, “या तो वो उसके साथ चलें या यहीं रहें।” कुन्दनलाल जी अवाक रह गए। उन्होंने कहा, “यह मेरा घर है, ये सभी मेरे अपने लोग। मैं इन्हें छोड़कर कहां जाऊं, मैं ही इन सबका सहारा हूं।”

लड़के कहा, “आपने इन सबका ठेका नहीं लिया हुआ है। मैं आपका अपना बेटा हूं, आपका खून हूं, आपको मेरा साथ देना चाहिए।”

कुन्दनलाल जी ने कहा, “डॉक्टर तू बना है, लेकिन सेवाभाव मन में नहीं आया है।”

लड़के ने कहा, “सेवा करने के लिए मैंने पढ़ाई नहीं की है। मैंने एक सुख भरे जीवन की कल्पना की है, जो कि यहां रहने से नहीं मिलेगा। आप मेरे साथ चलिए।” कुन्दनलाल जी नहीं माने। मैं चुप था। भारद्वाज जी भी चुप थे। कुन्दनलाल जी ने उसकी पढ़ाई के लिए पैसों की व्यवस्था कर दी और चुपचाप सोने चले गए। लड़का दूसरे दिन चला गया, अकेला ही बिना अपने पिता को साथ लिये, हमेशा के लिए।

कुन्दनलाल जी उसको पैसा भेजते रहे। वो पढ़ता रहा, उसने वहीं लन्दन में अपने साथ काम करने वाली डॉक्टर लड़की से शादी कर ली और फिर बीतते समय के साथ उसे एक बेटा भी पैदा हुआ। उसका नाम कुलदीप था और यह नाम कुन्दनलाल जी ने ही सुझाया था।

फिर वो दिन भी आ ही गया, जिसे मैं कभी भी याद भी नहीं करना चाहता। उस दिन कुन्दनलाल जी का जन्मदिन था। उन्हें सुबह से ही सीने में दर्द था। उनका बेटा गौतम लन्दन से आया हुआ था और वो शाम को मिलने आने वाला था। कुन्दनलाल जी की उससे मिलने की बहुत इच्छा थी, क्योंकि उनका पोता कुलदीप भी साथ आया हुआ था। उन्होंने अब तक उसे नहीं देखा था। हॉस्पिटल में उस दिन कोई नहीं था। हम सब उनके कमरे में थे, मैंने और भारद्वाज जी ने उनके कमरे को सजाया। शाम को करीब एक वकील साहब आये। कुन्दनलाल जी, वकील साहब और भारद्वाज जी के साथ अपनी बैठक में चले गए। करीब एक घंटे बाद वो सब बाहर निकले। कुन्दनलाल जी के चेहरे पर परम संतोष था।

फिर वो इंतजार करने लगे अपने बेटे, बहू और पोते का। मैंने सभी के लिए अच्छा सा खाना बनाया हुआ था और उनके लिए केक भी ले कर आया था। हम सब इंतजार ही कर रहे थे कि अचानक शहर में तेज बारिश होने लगी, बर्फ के ओले भी गिरे और आंधी-तूफान का माहौल हो गया, बिजली भी चली गयी। मैंने और भारद्वाज जी ने मोमबत्ती जलाई। हम इंतजार कर ही रहे थे कि उनका बेटा गौतम अपने परिवार के साथ आये, लेकिन कुछ ही देर बाद उसका फोन आ गया कि वो इस आंधी-तूफान में नहीं आ सकता। यह सुनकर कुन्दनलाल जी का चेहरा बुझ गया। उन्होंने हमें सो जाने को कहा और वापिस अपनी बैठक में जाकर दरवाजा अंदर से बंद कर लिया। हम दोनों चुपचाप थे। रात गहराती जा रही थी। मैंने भारद्वाज जी से कहा कि वो भी सो जाएं। उनके सोने के बहुत देर बाद रात करीब दो बजे मैंने हिम्मत करके कुन्दनलाल जी की बैठक में झांककर देखा, वो चुपचाप बैठे थे। बार-बार वो अपने फोन की ओर देख उठते थे कि शायद वो बजे और संदेशा आये कि उनका गौतम आ रहा है लेकिन, उसने न बजना था सो न बजा। केक वैसे ही पड़ा रहा। खाना किसी ने भी नहीं खाया।

मैं वहीं बैठक के बाहर बैठे-बैठे सो गया। सुबह-सुबह भारद्वाज जी ने मुझे उठाया। वो और कुन्दनलाल जी दोनों रोज सैर को जाते थे। रात बीत चुकी थी। आंधी-तूफान भी ठहर गया था। मैंने दरवाजा ठकठकाया। दरवाजा अन्दर से बंद था, कोई आवाज नहीं आई, हम दोनों आशंकित हो उठे और जोर-जोर से दरवाजा ठोका। फिर नहीं खुला तो तोड़ दिया। वही हुआ जिसका डर था। कुन्दनलाल जी चल बसे थे। मैं और भारद्वाज जी रोने लगे। इतने में गौतम अपनी पत्नी और कुलदीप के साथ आ पहुंचा। उसे सब कुछ समझते हुए देर नहीं लगी। वो अचानक ही चुप हो गया। भारद्वाज जी ने कहा, “गौतम तुम यहीं बैठो। इतने बड़े इंसान हैं, बहुत से लोग आयेंगे। बहुत सा काम करना होगा, हम सब इंतजाम करते हैं।”

अंतिम संस्कार हुआ, सारे शहर से लोग आये। मुझे भी उस दिन पता चला कि कुन्दनलाल जी की इस शहर में कितनी इज्जत थी। गौतम चुपचाप बैठा रहा, बहू भी चुपचाप ही थी, हां पोता कुलदीप थोड़ा परेशान सा था, विचलित था। उसने दादा को पहले कभी नहीं देखा था और जब देखा तो इस अवस्था में देखा था। वो बार-बार रो उठता था। गौतम चुपचाप इसलिए था कि उसने शहर के लोगों की भीड़ देखी थी और उसे समझ में आ गया था कि उसने क्या खो दिया है? मैं खुद हैरान सा था कि कितने सारे लोग उनसे प्रेम करते थे और कितनों का रो-रोकर बुरा हाल था।

सारा क्रियाकर्म निपटने के बाद, रात को हम जब बैठे तो सिर्फ झींगुरो की आवाजें ही सुनाई दे रही थीं। सभी बहुत चुपचाप थे। मैं था, भारद्वाज जी थे और गौतम था। इतने में वकील साहब आये। वो कुन्दनलाल जी के पुराने मित्र थे। उन्होंने कहा, “कल रात को शायद कुन्दनलाल को आशंका हो गयी थी कि वो शायद ज्यादा दिन नहीं रहेगा। उसने अपनी वसीयत करवा ली थी। मैं उसे आप सब को बताना चाहता हूं।”

मैं उठकर खड़ा हो गया। वकील ने मुझे बैठने को कहा। वकील ने कहा, “जायदाद के तीन हिस्से हुए हैं। एक बड़ा हिस्सा इस हॉस्पिटल और वृद्धाश्रम को दिया गया है। दूसरा हिस्सा पोते कुलदीप के लिए दिया गया है और तीसरा हिस्सा चौकीदार ईश्वर के नाम है।”

यह सुनकर मैं बहुत जोर से चौंका। मैंने कहा, “साहब, कोई गलती हो गयी होगी, मुझे कोई पैसा रकम नहीं चाहिए। मैं तो यही रहूंगा। सब कुछ मेरा अब यही है। कुन्दनलाल साहब मेरे पिता जैसे थे। उनके बाद अब मेरा कौन है।” कहकर मैं रोने लगा।

वकील ने समझाया, “भाई जो उन्होंने कहा, वो मैंने किया, भारद्वाज भी थे वहां। पूछ लो।”

मैंने कहा, “मुझे कुछ नहीं चाहिए, मेरा हिस्सा भी कुलदीप को ही दे दीजिये।” वकील ने मेरा सिर थपथपाया। मैं चुपचाप आंसू बहाने लगा।

गौतम चुपचाप उठकर खड़ा हो गया। उसने कहा, “कल सुबह मिलते हैं, राख को नदी में बहाने जाना है।”

रात बहुत गहरी हो रही थी और मेरी आंखों में नींद नहीं थी। कल तक मैं कुछ भी नहीं था और आज इस जायदाद के एक हिस्से का मालिक। लेकिन मैं इस रुपये का क्या करूंगा, मेरे तो आगे पीछे कोई है ही नहीं। नहीं नहीं, मुझे कुछ नहीं चाहिए। मैं तो इसी जगह के एक कोने में पड़ा रहूंगा।

सुबह हुई, हम सब वही पास में मौजूद नदी के किनारे चले, रास्ते में शमशान घाट से कुन्दनलाल जी की चिता में से राख ली और नदी में जाकर उसे बहा दिया। मेरी आंखों से आंसू बहने लगे। भारद्वाज भी रोने लगे। उनका सबसे पुराना और गहरा मित्र जो चला गया था। लड़का जो कल तक कुछ नहीं बोला, आज रोने लगा, उसकी पत्नी भी रोने लगी और कुलदीप भी रोने लगा। कुछ देर के शोक के बाद सब वापिस आये। वो अचानक ही बहुत शांत हो गया था, अब उसे समझ आ गया था कि जो उसने खोया था वो कभी भी वापिस नहीं आने वाला था।

तेरहवीं के भोज के बाद गौतम मेरे और भारद्वाज के पास आया, उसने उन्हें एक लिफाफा दिया और कहा, “मैं सारी वसीयत, जो पिताजी ने कुलदीप के नाम की है, उसे इस वृद्धाश्रम और ईश्वर को देता हूं। इसके सही हकदार यही दोनों हैं।”

मैं शांत था। मैंने एक बार कहा, “गौतम भैया, अगर यहीं रुक जाते तो हम सभी को बहुत खुशी होती।”

गौतम चुपचाप रहा, कुछ नहीं कहा। शायद कुछ कहने के लिए था ही नहीं।

दूसरे दिन गौतम वापिस चला गया। शायद हमेशा के लिए। शायद कभी भी वापिस नहीं आने के लिए।

मैंने वकील से कहकर सारी जायदाद जो कि मेरे नाम थी, उसे उस वृद्धाश्रम के नाम कर दी। अब चूंकि कुन्दनलाल जी नहीं रहे तो धीरे-धीरे हॉस्पिटल बंद हो गया और फिर कुछ दिनों के बाद सिर्फ, वृद्धाश्रम ही रह गया। भारद्वाज जी सारा काम-काज संभालते और मैं सबकी सेवा करते रहता।

मैंने भारद्वाज से वचन लिया कि वो किसी से इस बारे में नहीं कहेंगे कि इस वृद्धाश्रम में मेरा क्या योगदान है। मैंने कहा कि मैं इसी चौकीदार वाले रूप में खुश हूं और मुझे यहीं बने रहने दीजिये। भारद्वाज जी नहीं माने, मैंने फिर उन्हें अपनी कसम दी, वो चुप हो गए। उन्होंने कहा, “बेटा, तू सच में ईश्वर है। भगवान हर किसी को तेरे जैसी ही औलाद दे।”

वृद्धाश्रम चल पड़ा। यहां हर महीने कोई न कोई आ जाता, कोई न कोई गुजर जाता। मैं कई बातों का अभ्यस्त हो चुका था। जिंदगी चल रही थी, एक दूसरे के सुख दुःख बांटते थे, मिलकर काम करते थे। हमने कुछ नर्सें रखी हुई थीं, कुछ लोग रखे हुए थे। सब इस आश्रम की देखभाल करते थे। भारद्वाज जी ने सभी से कह दिया था कि ईश्वर की बात हर कोई माने। बहुत कम लोग मुझे ईश्वर कहकर पुकारते थे। ज्यादातर लोग मुझे सिर्फ चौकीदार ही कहते थे और मुझे इससे कोई शिकायत भी नहीं थी।

कई तरह की कहानियों और किस्सों से भरा हुआ है यह वृद्धाश्रम। आश्रम में बैठी इन बूढ़ी आंखों में कभी जीवन के संघर्षों की कहानी तैरती है तो कभी उस बगिया की कहानी तैरती है जिसे बनाने के लिए इस बागवान ने अपना पूरा जीवन ही खर्च कर दिया। बावजूद इसके जीवन के अंतिम क्षणों में भी वह एकदम अकेले ही हैं। शायद कोई उनका यह अकेलापन दूर करने वाला होता। अब तो एक दूसरे के साथी ही बनकर यह बुजुर्ग बीत चुकी अपनी जिंदगी के खट्टे मीठे अनुभवों को साझा कर मुस्कुरा भी लेते हैं तो कभी एक दूसरे की आंख पोंछकर ढांढस भी बधांते हैं। लेकिन एक बात यहां बहुत अच्छी है, लोग यहां आकर अपने दुःख भूल जाते हैं और सब एक ही परिवार का हिस्सा बनकर रहते हैं। मेरे परिवार का, हां, यह मेरा ही तो परिवार है एक बड़ा सा भरा हुआ परिवार। मेरा अपना तो कोई है नहीं, लेकिन ये सभी अब मेरे अपनी ही बन गए हैं। यह तो परमात्मा की ही कृपा थी कि कुन्दनलाल जी, भारद्वाज जी और मैं, हम सब की सोच एक जैसी थी और इस सपने को हमने जीवन दिया। यहां हर धर्म के लोग रहते है और यहां हर त्यौहार भी मनाया जाता है। बस जीवन के अंतिम दिनों में सभी खुश रहें यही हम सबकी एक निरंतर कोशिश रहती है। बस एक कमी है, और वो है हॉस्पिटल की सेवाएं, उसके लिए हमें दूसरों पर, दूसरे हॉस्पिटल्स पर निर्भर रहना पड़ता था। अब सभी बूढ़े थे। सो हमेशा कोई न कोई बीमार ही रहता था। अक्सर हमें किसी न किसी को हॉस्पिटल ले जाना पड़ता था। आश्रम के पास एक एम्बुलेंस थी और शांति थोड़ा-बहुत प्राथमिक उपचार कर लेती थी, पर हमेशा ही हॉस्पिटल जाना पड़ जाता था। अक्सर ऐसे मौकों पर एक कसक सी दिल में उठती थी कि काश उस वक्त कुन्दनलाल जी का बेटा गौतम यहां रुक गया होता या पढ़ाई पूरी करके यहीं बस गया होता तो वो हॉस्पिटल कभी भी बंद नहीं होता। खैर विधि का विधान जो भी हो।

आज सुबह मैं थोड़ा जल्दी उठ गया हूं। कुछ अच्छा नहीं लग रहा है। शायद उम्र का असर था। पता नहीं मेरी उम्र कितनी हो गयी है, आजकल कुछ याद भी नहीं रहता। भारद्वाज जी ने आकर मुझे देखा और कहा, “ईश्वर शायद तुम्हारी तबियत खराब है, तुम आराम कर लो।”

मैंने कहा, “जी कुछ नहीं, थोड़ी सी हरारत है शायद उम्र थका रही है।”

इतने में एक कार आकर रुकी। हम दोनों ने पलटकर दरवाजे की ओर देखा। कार से अचानक एक आवाज आई, “ईश्वर काका!” मेरे लिए ये एक नया संबोधन था। सब मुझे चौकीदार ही कहकर पुकारते थे। बाहर की दुनिया में किसी को मेरा असली नाम पता नहीं था। हम दोनों ने गौर से देखा। कार का दरवाजा खुला और एक सुखद आश्चर्य की तरह कुन्दनलाल जी का बेटा गौतम, एक नौजवान के साथ उतरा। मुझे बहुत अच्छा लगा, मैंने भारद्वाज जी से कहा, “जरूर यह कुलदीप होगा। कुन्दनलाल जी का पोता।”

पास आकर गौतम ने कहा, “हां ईश्वर, यह कुलदीप है।”

कुलदीप ने मेरे पास आकर मेरे पैर छुए तो मेरी आंखें छलक गयीं। पहली बार किसी ने मेरे पैर छुए थे। मेरे हाथ कांपते हुए आशीर्वाद देने के लिए उठ गए। कुलदीप ने कहा, “ईश्वर काका, मैं आज आपसे अपने पिता जी की तरफ से माफी मांगने आया हूं और दादाजी का सपना पूरा करने आया हूं।” मेरी आंखें खुशी से बह रही थीं। कुलदीप ने आगे कहा, “मैंने भी डॉक्टरी की पढ़ाई पूरी कर ली है और अब मैं और पिता जी यहीं रहेंगे और दादा जी का सपना पूरा करेंगे।”

मैंने कंपकंपाते स्वर में पूछा, “और मां?”

गौतम ने कहा, “वो नहीं रही। इसी साल उसका देहांत हो गया और मैंने फैसला कर लिया है कि अब हम यहीं आकर रहें। आपने और भारद्वाज अंकल ने जो निस्वार्थ सेवा का बीड़ा उठाया है, अब हम भी उसमें अपना योगदान देंगे। यही सच्चे अर्थों में हमारी वापसी होगी, अपने देश के लिए, अपने पिता के लिए, उनके उद्देश्य के लिए और यही हमारा प्रायश्चित होगा।” इतना कहकर गौतम ने अपनी आंखों से आंसू पोंछे।

शान्ति जो इतने देर से पीछे से आकर हमारी बातें सुन रही थी, वो अपने आंसू पोंछते हुए वापिस मुड़कर आश्रम के भीतर गयी और एक पूजा की थाली ले आई। आरती का दीया जलाकर दोनों की आरती उतारते हुए उसने कहा, “पधारो आपणे देश बेटा।” हम सबकी आंखें भीग उठीं।

गौतम ने एक लिफाफा निकालकर मेरे और भारद्वाज जी के हाथों में दिया और कहा, “इसमें मेरी सारी संपत्ति के कागजात हैं। मैंने अपना सब कुछ इस वृद्धाश्रम को दे दिया है और इसकी सारी जिम्मेदारी ईश्वर और भारद्वाज अंकल को सौंपी है, सब कुछ अब इस आश्रम की मिट्टी के लिए।”

यह सुनकर मैं रो पड़ा। मेरा दर्द और बढ़ गया और मैं कांपकर गिर पड़ा। कुलदीप ने तुरंत मेरी नब्ज को देखा और कहा, “अरे आपकी नब्ज डूब रही है। जल्दी इन्हें हॉस्पिटल ले चलो।”

मैंने कहा, “बस बेटा आज का ही इंतजार था, तुम्हारी वापसी हो गयी और मुझे अब क्या चाहिए? बस अब चलता हूं।”

कुलदीप ने कहा, “कुछ नहीं होगा, आपको माइल्ड हार्ट अटैक आया है, सब ठीक हो जायेगा।”

भारद्वाज जी ने जल्दी से आश्रम के एम्बुलेंस का इंतजाम किया और मुझे उसमें लिटाकर शहर के एक हार्ट हॉस्पिटल की ओर चल पड़े।

मैंने धीरे से आंखें खोलीं। एम्बुलेंस शहर के एक बड़े हार्ट हॉस्पिटल की ओर जा रही थी। मेरी बगल में भारद्वाज जी, गौतम और कुलदीप बैठे थे। मुझे देखकर कुलदीप ने मेरा हाथ थपथपाया और कहा, “ईश्वर काका, आप चिंता न करे। मैंने हॉस्पिटल में डॉक्टर्स से बात कर ली है, मेरा ही एक दोस्त वहां पर हार्ट सर्जन है, सब ठीक हो जायेगा।” गौतम और भारद्वाज जी ने एक साथ कहा, “हां सब ठीक हो जायेगा।” मैंने भी धीरे से सिर हिलाकर हां का इशारा किया। मुझे यकीन था कि अब सब ठीक हो जायेगा। मैंने फिर आंखें बंद कर लीं।

हॉस्पिटल आ गया था। मुझे स्ट्रेचर पर ऑपरेशन थिएटर के भीतर ले जाया जा रहा था। मैंने चारों तरफ सभी को देखा, मुझे खुशी थी। वृद्धाश्रम अब बेहतर हाथों में था। कुन्दनलाल जी का और मेरा सपना सच हो गया था। मैंने सभी को प्रणाम किया और भीतर की ओर चल पड़ा। अब सब ठीक हो गया था। अब कोई दुःख मन में नहीं था और मुझे यकीन था कि मैं भी ठीक हो ही जाऊंगा, फिर से अपने वृद्धाश्रम की सेवा करने के लिए।