ISSN NO: 2581-8074 मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान की अन्तर्राष्ट्रीय शोध पत्रिका (Multidisciplinary) Peer Reviewed Journal

लीलाधर मंडलोई जी से डॉ मलखान सिंह की बातचीत

डॉ. मलखान सिंह
विविधा
डॉ. मलखान सिंह

असिस्टेंट प्रोफेसर (हिन्दी) भारतीय भाषा केंद्र, भाषा साहित्य और संस्कृति अध्ययन संस्थान जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय

समकालीन कविता के बहुपठित – बहुचर्चित कवि लीलाधर मंडलोई जी से डॉ मलखान सिंह की बातचीत का यह अंश कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। पहला यह कि मंडलोई जी की काव्य चेतना वैचारिक दुराग्रह की जकड़बंदी से परहेज करती है,दूसरा यह कि उनकी कविता प्रकृति के प्रति अत्यंत सवेदनशील बनाती है। उनका काव्य संसार उदात्त विचारों के साथ विकसित होता है, जिसमें प्रकृति ही सबसे बड़ी प्रेरणा शक्ति है।उनकी कविता शोर नहीं मचाती ,नारेबाजी नहीं करती बल्कि अपने पाठकों से सहृदय मित्र की तरह बातचीत करती है । कुतर्क या जिद्द नहीं करती बल्कि संवाद के द्वारा जीवन की अनंत संभावनाओं की तलाश करती है । अपने पाठकों को अपना मित्र बना लेने वाली कविता के रचयिता हैं –लीलाधार मंडलोई । प्रस्तुत है उनसे बातचीत के कुछ अंश –

 अपनी दिल्ली तक की यात्रा के बारे में कुछ बताइए ? कहाँ से ,कैसे ,किन पड़ावों से होते हुए यहाँ तक पहुंचे हैं ?

 मेरा जन्म छिंदवाड़ा जिले के गुढ़ी गाँव में हुआ । मेरे माता – पिता होशंगाबाद जिले के रहने वाले थे ।जो जीविका की तलाश में यहाँ आकार बस गए थे । कोयला की खदानों मे काम करते थे । नदियों पहाड़ों से घिरे इस इलाके में पेड़ों के नीचे मेरी प्रारम्भिक शिक्षा हुई । आगे की पढ़ाई 11 किलो मीटर दूर स्थित एक मिशन स्कूल में हुई ।नदी पार करके रोज पैदल स्कूल जाते थे । तब आवागमन के साधन नहीं थे । एक अनिल बाबू थे, जो गुजराती थे –वे पढ़ने के लिए लगातार प्रोत्साहित करते थे । उच्च शिक्षा के लिए भोपाल में पढ़ने का मौका मिला। वहाँ छात्रवृत्ति मिलती थी इसलिए पढ़ाई पूरी हो गयी । फिर सेंट्रल स्कूल में नौकरी लग गयी । सतपुड़ा की शृंखला और नर्मदा की धार ने मेरे भीतर के कवि को गढ़ा । इस प्रकार मेरा जीवन ढला ।

 यानी हम कह सकते हैं कि आपके निर्माण में प्रकृति का सर्वाधिक प्रभाव रहा । इसलिए आपकी कविता में प्रकृति बिम्ब के रूप में ,प्रतीक के रूप में और चेतना के रूप मे सर्वत्र मौजूद है ।

 इस सृष्टि का सबसे बड़ा कलाकार कौन है –सबसे बड़ा कवि कौन है –सबसे बड़ा शिक्षक कौन है – प्रकृति । स्वाभाविक है उसका प्रभाव सर्वाधिक होगा। आज प्रकृति का संकट सबसे बड़ा संकट है ,इसलिए प्रकृति के प्रति बेचैनी मेरी कविताओं में देखने को मिलती है ।

 आपकी कवितायें पर्यावरण विमर्श को संवेदना का नया धरातल प्रदान करती हैं ।जब आपको प्रकृति संवेदना कवि कहा जाता है तो आपको कैसा लगता है । आप पर्यावरणीय संकट को किस तरह देखते हैं ?

पर्यावरण का संकट एक वैश्विक संकट है ।इसके प्रति आज सजग नहीं हुए तो फिर कुछ नहीं बचेगा । प्रकृति है तो जीवन है । मेरी कविताओं में पर्यावरण के प्रति बेचैन कवि की छटपटाहट है । वे अपने पाठकों का ध्यान उस मूल भूत समस्या कि ओर आकर्षित करती हैं जो पर्यावरणीय संकट से जुड़ी हैं । पर्यावरण के प्रति संवेदनशील समाज का निर्माण करना आज की शिक्षा का मुख्य उद्देश्य है ।इस उद्देश्य के अनुरूप आज का कवि सृजनरत है । इसलिए जब प्रकृति संवेदना का कवि कहा जाता है तो लिखना पढ़ना सार्थक लगता है ।

 क्या कभी स्कूल में आपके साथ भी जाति के आधार पर भेदभाव किया जाता था ?

 जाति के आधार पर भेदभाव आज भी होता है । अगर ऐसा न होता अंबेडकर जैसे लोगों को क्लास के आधार पर होने वाले अन्याय के खिलाफ क्यों लिखना पड़ता ।क्लास में झाड़ू लगाना ।पानी भरकर नदी से लाना । ये सब काम सामान्य बच्चों से नहीं कराया जाता था , जो निम्न वर्ग से संबन्धित थे, वही करते थे । मैंने साइंस छोड़ दिया क्यों कि एक टीचर वाजपेयी जी थे वे मुझसे बहुत चिढ़ते थे । मेरे सही उत्तर देने पर भी मुझे मारते थे । तंग आकार मैंने साइंस छोड़ दिया।जो शोषित होता है उसमे प्रतिरोध का गुण अनिवार्य रूप से मिलता है । यह प्रतिरोध ही आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है । इसका प्रभाव बहुत ज्यादा पड़ता है कि तुम मुझे जाति के आधार पर हराते हो तो मैं तुम्हें पढ़ाई मे हराऊंगा ।जिसमे यह भावना प्रबल होती है वही आगे निकाल जाता है। मैं लगातार अपनी कक्षा मे प्रथम आता रहा ।

 पहली कविता कब और किन स्थातियों में लिखी ।

 आपके भीतर जो एक नैसर्गिक क्रोध होता वही कविता बनकर फूटता है ।समाज में जो जातिगत भेदभाव था – अन्याय था ,उसके विरुद्ध जो आक्रोश था वही कविता बन गया ।लिखना तो मैं 1975 से शुरू कर दिया था लेकिन पहला संग्रह 1990 में छपा। 1980 में लहर पत्रिका के कविता विशेषांक में मेरी पहली कविता छपी थी । वह कविता है —

धरती मैं तुझे बच्चेकी तरह गोद में उठाकर

चूमना चाहता हूँ तुम्हारी दुखती रगों को

सदियों से घूमते घूमते कितनी थक गयी होगी तुम

मैं तुम्हें एक पल की झपकी के लिए सुलाना चाहता हूँ ।

 प्रारम्भ में आप किस कवि से सर्वाधिक प्रभावित रहे ?

 लोक साहित्य में ईसुरी ,मध्यकाल में कबीर और तुलसी से, आधुनिक काल में नागार्जुन से प्रभावित रहा । हमारी परवरिश आपातकाल के वातावरण में हुई ।उस समय के जो नायक थे उनका भी प्रभाव पड़ा । आज के युवा कवियों में अनुज लुगुन ,मोहन डहेरिया ,नीलेश रघुवंशी ,आशुतोष ,कुमार अंबुज आदि हैं।

 आप पर वैचारिक रंग किसका ज्यादा चढ़ा ।

 मैं जिस दुनिया से आया उसमे जो चेतना बनी उसे कई बार विचार धारा मान लिया जाता है जब कि ऐसा नहीं है । मुझमे कबीर, अंबेडकर ,फुले,तुकाराम का प्रभाव ज्यादा रहा । जहां तक रंग की बात है तो मुझमे जो भी रंग हैं, रेखाएँ हैं ,कहन है उन सबमे सिर्फ लोक का रंग ज्यादा है ।

 आपके अनुसार कविता क्या है ? क्या कलात्मक अहं की तुष्टि है या वैचारिक हथियार है या कुछ और ?

 प्रथमतः और अंततः कविता आपके भीतर के संसार को अभिव्यक्त करने का साधन मात्र है । जैसी आपकी परवरिश होती है ,उसके हिसाब से आपका सौंदर्यबोध ,आपकी वैचारिकता अपने आप बनती चली जाती है । प्रथमतः और अंततः कविता एक प्रक्रिया से बनती है किसी विचारधारा से नहीं । इस प्रकार अपने आपको अभिव्यक्त करने का माध्यम है कविता । उससे दो तरह की तुष्टि होती है एक यह कि आपके भीतर जो चीजें आकार ले रही हैं वो कागज पर आकर जब हम उसकी कविता के रूप मे या गद्य के रूप में पुनर्रचना करते हैं तो उसका परिष्कार होता है ।

 आज कविता के सामने सबसे बड़ा संकट क्या है ?

 कविता के सामने नहीं ,कवि के सामने संकट है , वह उस चीज को समझ ही नहीं पा रहा कि संकट क्या है ।

 क्या आप भी मानते हैं की कविता का जीवन संकट में है ?

 यह बात पुरानी हो गयी ,आज कविता की पहुँच बढ़ी है । डिजिटल प्लेटफार्म ने कविता को नया जीवन दे दिया है ।

 समकालीन कविता का वैशिष्ठ्य क्या है और कमजोरी क्या मानते है ?

 समकालीन कविता में कथ्य के स्तर पर सबसे महत्वपूर्ण जीवन और समाज है।जो दृश्य में दिख रहा है उसे अंतिम सत्य मानना समकालीन कविता की कमजोरी है । सत्य कई पर्त के पीछे छिपा है उस तक पहुंचना समकालीन कविता की सबसे बड़ी चुनौती है ।

 समकालीन कविता का संसार कैसा है ?

 समकालीन कविता के केंद्र में सम्पूर्ण सृष्टि की चिंता है। वह प्रकृति के प्रति अत्यंत संवेदनशील बनाने वाली दुनिया है । यद्पि वह सत्य को पकड़ ना पाने की बेचैनी से भरा हुआ काव्य संसार है ।

इस बेचैनी को मेरी एक कविता ‘ लिखे में रंग’ पर देख सकते हैं –

क्या मेरे लिखे मे रंग आ सकते हैं

रंगों के भीतर के रंग

छायाओं के भीतर की छायाएं

बर्फ के भीतर का आकाश रंग

मैं किस चित्रकार के पास जाऊँ

उन रंगों को शब्द रंगों में लाने के लिए

 आप काव्य सृजन में क्या सावधानी बरतते हैं और नये रचनाकारों को क्या सावधानी बरतने को कहेंगें ?

 पहला यह कि आपका लेखन सत्य के करीब होना चाहिए,दूसरा यह कि उसमे कहनका गुण है कि नहीं ।

 आपके अनुसारविमर्शवादी साहित्य की बड़ी उपलब्धि क्या है ? उसका कमजोर पक्ष क्या हैं ?

 विमर्श शब्द ही हमारा नहीं है ,हमारी परंपरा विचारविमर्श की रही है ,जिसमें शास्त्रार्थ होता था किसी सच की परिणति को प्राप्त करते थे । आज का विमर्श सिर्फ कलह करता है किसी निष्कर्ष तक नहीं ले जाता । स्त्री को आजादी किससे चाहिए ।

 दलित विमर्श और आदिवासी विमर्श में अलगाव क्यों है ?

 आदिवासी विमर्श अपनी पहचान को बचाने का विमर्श है ।आदिवासियों की सबसे बड़ी चिंता अपनी भाषा और संस्कृति की है, जो कि दलितों के यहाँ गौड़ है। आदिवासी विमर्श के केंद्र में सम्पूर्ण सृष्टि की चिंता है । आदिवासियों के यहाँ केवल आर्थिक सवाल नहीं है बल्कि सांस्कृतिक सवाल भी है। आदिवासी अपने अस्तित्व को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं ,जबकि दलित ,दलित के रूप में अपने अस्तित्व को खत्म करने की लड़ाई लड़ रहे हैं । आज दुनिया के बड़े-बड़े पर्यावरणविद आदिवासी चिंतन को अपना रहे हैं ।

 इतने उतार -चढ़ाव , संघर्ष के बाद साहित्यिक दुनिया के इस उच्च मुकाम में पहुँचकर आपको कैसा लग रहा है ?

 बहुत अच्छा लग रहा है ।बहुत आशावान हूँ। अभी उम्मीदें बाकी हैं ।

 धन्यवाद सर !

संप्रति :

  1. डॉ मलखान सिंह – असिस्टेंट प्रोफेसर (हिन्दी)
  2. लीलाधार मंडलोई – वरिष्ठ कवि



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