नया अंक, जुलाई 2023
जब सब कुछ बिकाऊ हो, मनुष्य की पहचान एक उपभोक्ता से ज्यादा न हो, मानवीय रिश्तों की मिठास कम होती जा रही हो, जीवन मनोविकारों का शिकार होता जा रहा हो तब ऐसे चुनौतीपूर्ण माहौल में साहित्यिक पत्रिकाओं का प्रकाशन एक महत्वपूर्ण रचनात्मक पहल है। इसके माध्यम से न केवल नए- नए रचनाकारों की सृजन धर्मिता से परिचय होगा अपितु उनके माध्यम से वर्तमान साहित्यिक कलेवर को जानने समझने का एक अवसर भी मिलेगा। पत्रिका का यह अंक कई स्तर से विशिष्ट है क्योंकि इसमें विषय विविधता के साथ-साथ साहित्यिक स्वाद के कई फ्लेवर मिलते हैं। मुझे विश्वास है कि पत्रिका का यह अंक आपके ज्ञानवर्धन में सहायक सिद्ध होगा...
शुभकामनाओं सहित!
(संपादकीय से)- डॉ. मलखान सिंह
प्रचेतस
मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान की अन्तर्राष्ट्रीय शोध पत्रिका (Multidisciplinary)
अंक 02
गिरीश कर्नाड के नाटक ‘नागमंडल’ की तात्विक समीक्षा
संदीप शर्मा
वैश्वीकरण और भारतीय संस्कृति
प्रो. रसाल सिंह, डॉ पीयूष कुमार
'विश्वप्रपंच’ की भूमिका और भारत बोध
डॉ. आलोक कुमार सिंह
परफेक्शन को पाने की ललक
डॉ. धीरेन्द्र कुमार
नागार्जुन के काव्य में संवेदना के विविध स्वर
सुमित कुमार चौधरी
कुमार अंबुज की कविता और उनका आत्मसंघर्ष
यशवंत
अरुणाचल प्रदेश के गालो जनजाति: समाज एवं संस्कृति (‘मिनाम’ उपन्यास के विशेष संदर्भ में)
उद्देश्य सिंह
समकालीन ओड़िआ कहानी के विविध आयाम
बिश्वजीत कलता
राष्ट्रीय शिक्षा नीति और आत्मनिर्भर भारत
अमित कुमार यादव
कामायनी का पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता
संजय साव
कलंक
प्रवीण कुमार सहगल
ईश्वर काका
निशा सहगल
तितास एक नदी का नाम
महेंद्र सिंह
बचपन की सुनहरी यादों का जीवंत दस्तावेज: ‘बाली उमर’
बिश्वजीत कलता
ग़म के नाम…
कुलदीप सिंह
लीलाधर मंडलोई जी से डॉ मलखान सिंह की बातचीत
डॉ. मलखान सिंह
एक अलम-नसीब बेटे की कविता
आमिर हमज़ा
संपादक की कलम से …
डॉ. मलखान सिंह