साहित्य समाज को उदात्त, मूल्यगर्भित और संवेदनशील बनाने के साथ-साथ इसकी गति और मति का निर्धारण भी करता है। इसलिए साहित्य न केवल समाज की ऊर्जा है अपितु उसकी संजीवनी भी है। साहित्य हमारे अतीत, वर्तमान और भविष्य को संबोधित करता है। यथार्थ और स्वप्न के धरातल पर सत् और असत्-बोध के साथ जीना सिखाता है; आचार-विचार को संस्कारित और परिष्कृत करता है; विकट और भयावह स्थितियों में निर्णय लेने की क्षमता का विकास करता है। वह उपदेश नहीं देता बल्कि आत्मबल को मजबूत और चेतना को धारदार बनाता है। वह अनंत संभावनाओं के बीच रोपित करता है, इसलिए साहित्य हर दशा में ‘मंगल भवन अमंगल हारी’ होता है।
जब बाजार से साहित्यिक रचनाएं लुप्त होने लगें, उनके पाठक सिकुड़ने लगें तो यह संवेदनशील मनुष्य के निर्माण की लड़ाई के कमजोर पड़ने और बाजारवादी ताकत के मजबूत होने का संकेत है। ऐसे में रचनात्मक वातावरण, रचनात्मक प्रोत्साहन और रचनात्मक आलोचना के द्वारा ही साहित्यिक जगत में बाजारवादी हमले को रोका जा सकता है।
जब सब कुछ बिकाऊ हो, मनुष्य की पहचान एक उपभोक्ता से ज्यादा न हो, मानवीय रिश्तों की मिठास कम होती जा रही हो, जीवन मनोविकारों का शिकार होता जा रहा हो तब ऐसे चुनौतीपूर्ण माहौल में साहित्यिक पत्रिकाओं का प्रकाशन एक महत्वपूर्ण रचनात्मक पहल है। इसके माध्यम से न केवल नए-नए रचनाकारों की सृजन धर्मिता से परिचय होगा अपितु उनके माध्यम से वर्तमान साहित्यिक कलेवर को जानने-समझने का एक अवसर भी मिलेगा। पत्रिका का यह अंक कई स्तर से विशिष्ट है क्योंकि इसमें विषय विविधता के साथ-साथ साहित्यिक स्वाद के कई फ्लेवर मिलते हैं। मुझे विश्वास है कि पत्रिका का यह अंक आपके ज्ञानवर्धन में सहायक सिद्ध होगा...
शुभकामनाओं सहित!