ISSN NO: 2581-8074 मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान की अन्तर्राष्ट्रीय शोध पत्रिका (Multidisciplinary) Peer Reviewed Journal

वैश्वीकरण और भारतीय संस्कृति

प्रो. रसाल सिंह, डॉ पीयूष कुमार
शोध आलेख

किसी भी देश के विकास में उसकी अर्थव्यवस्था का महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। किसी भी राष्ट्र का सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक विकास सुदृढ़ अर्थव्यवस्था के आधार पर विनिर्मित होता है। इसीलिए प्रत्येक देश समय-समय पर विभिन्न आर्थिक नीतियों को लागू करते रहते हैं और समय-समय पर उनमें उचित संशोधन भी करते रहते हैं। वैश्वीकरण का संदर्भ इसी अर्थतंत्र से ही जुड़ा है। इसे भूमंडलीकरण (ग्लोबलाइजेशन) भी कहा गया। वैश्वीकरण के विभिन्न सोपानों पर प्रकाश डालने से पूर्व भूमंडलीकरण को लेकर विभिन्न विद्वानों के मतों को जान लेना भी आवश्यक प्रतीत होता है। प्रसिद्ध चिंतक सच्चिदानंद सिन्हा ने वैश्वीकरण को पूंजीवाद के प्रसार के रूप में देखा है। उनका मानना है कि – “वैश्वीकरण का अभियान पूँजीवाद को राष्ट्रीय दायरों से परे ले जाने की अभिलाषा की अभिव्यक्ति है।”(1) जाने-माने अर्थशास्त्री कमल नयन काबरा भूमंडलीकरण को केवल आर्थिक घटना नहीं मानते। वे इसके तमाम नकारात्मक पक्षों को भी खुलकर उद्घाटित करते हैं। वे लिखते हैं कि – “भूमण्डलीकरण महज आर्थिक प्रवृत्ति या घटना नहीं है। इसके कई रूप हैं, जो आपस में जुड़े हुए हैं।…. भूमण्डलीकरण का कार्यक्षेत्र तकनीक, निवेश और निर्माण तक सीमित नहीं है, अपितु युद्ध, आक्रमण, नरसंहार और विनाश आदि आयामों तक फैला हुआ है।”(2)

इसके अतिरिक्त भी प्रभृति विद्वानों ने भी भूमंडलीकरण को अपने-अपने ढंग से समझने-समझाने का प्रयास किया है। इसी दिशा में राकेश कुमार ने भी भूमंडलीकरण के छद्म को बेनकाब किया है। वे इसकी ग्लोबल-गाँव विरुद्ध प्रवृत्ति की ओर इशारा करते हुए कहते हैं कि – “यह भूमंडलीकरण दुनिया का एकीकरण नहीं है, अपितु टेक्नोलॉजी द्वारा उसे बाँधने, साधने, नियंत्रित करने तथा उन पर अपना वर्चस्व स्थापित करने, मुक्त व्यापार करने, अधिकाधिक मुनाफ़े कमाने का विस्तारवादी, सत्तावर्चश्ववादी, एकाधिकारवादी पूँजी और व्यापार का भूमंडलीकरण है।”(3) राकेश कुमार की परिभाषा वैश्वीकरण विषयक कई प्रकार की भ्रांतियों को दूर कर देती है। प्रसिद्ध स्त्रीवादी लेखिका प्रभा खेतान ने भी भूमंडलीकरण को स्पष्ट करने का प्रयास किया है। उनकी परिभाषा कुछ संतुलित और सैद्धांतिक जान पड़ती है। उनका कहना है कि – “भूमंडलीकरण वह प्रक्रिया है जो वित्त-पूंजी के निवेश, उत्पादन और बाजार द्वारा राष्ट्रीय सीमा में ही वर्चस्वी नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सीमा से परे भूमंडलीय आधार पर निरंतर अपना प्रसार करना चाहती है।”(4) अतएव उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि भूमंडलीकरण या वैश्वीकरण वह प्रक्रिया है को वैश्विक स्तर पर व्यापार एवं वाणिज्य की परिव्याप्ति कर पूँजी की महत्ता को प्रतिपादित करती है।

विद्वानों द्वारा अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से वैश्वीकरण को कई चरणों में व्याख्यायित करने का यत्न किया गया है। वैश्वीकरण का प्रथम चरण उन्नीसवीं सदी के मध्य से लेकर प्रथम विश्वयुद्ध अर्थात् 1850-1914 ई. तक माना जाता है। औद्योगीकरण इस बीच फलता-फूलता है। इसी समय ब्रिटिश हुकूमत ने तमाम देशों में अपना उपनिवेश स्थापित किया। लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति विलियम मैक्निले की वैश्वीकरण की नीति के चलते ब्रिटिश उपनिवेशवाद को झटका लगा। ब्रिटिश के एकछत्र राज्य को अमेरिका से चुनौती मिली और उन्नीसवीं सदी के अंत तक ब्रिटिश का स्थान अमेरिका ने ले लिया। अमेरिका ने इस बीच काफ़ी उन्नति की। कई अविष्कार किये। परिवहन, यातायात, भाप इंजन, जहाजरानी, स्वेज और पनामा नहरों के निर्माण आदि ने अमेरिकी प्रगति को बल प्रदान किया। “आवागमन, परिवहन और संचार के इन समुन्नत साधनों ने दुनिया के देशों के बीच भौगोलिक दूरियों को समाप्तप्राय कर भूमंडलीकरण की प्रक्रिया को तेज कर दिया।”(5) वैश्वीकरण का दूसरा चरण प्रथम विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद से लेकर बीसवीं सदी के मध्य अर्थात 1914-1950 तक माना जाता है। इस बीच तकनीकी एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अभूतपूर्व विकास हुआ लेकिन विश्वयुद्ध के चलते देशों के बीच बढ़ती दूरी और वैमनस्यता ने भूमंडलीकरण की गति को अपेक्षाकृत धीमा कर दिया। फिर भी इस दरम्यान सांस्कृतिक और शैक्षिक प्रगति ख़ूब हुई। कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की स्थापना हुई। संग्रहालय, ग्रंथालय आदि खुले। अमेरिका में ही सैकड़ों अंतरराष्ट्रीय गोष्ठियाँ और परिसंवाद आयोजित हुए। भारत की आज़ादी तक तकरीबन सौ से भी अधिक देश अंतरराष्ट्रीय उड्डयन व्यवस्था से जुड़ गए थे। अमेरिका ने परमाणु परीक्षण किया और अपनी सैन्य व्यवस्था को काफ़ी सुदृढ़ किया। इसी बीच कम्प्यूटर के आविष्कार ने भी क्रांति मचा दी। वैश्वीकरण की गति को एक और महत्त्वपूर्ण कार्य ने बढ़ा दिया और वह था विश्व बैंक का गठन। विश्वयुद्धों से ध्वस्त हुई ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और जापान आदि देशों की अर्थव्यवस्था को लेकर अमेरिका संजीदा हुआ। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक से जहाँ एक ओर उसने ऋण प्रदान किया वहीं दूसरी ओर अपने उत्पादों की बिक्री भी करने लगा। फलतः अमेरिका शक्तिशाली होता गया।

सन् 1951 से लेकर 1990 तक के कालखंड को वैश्वीकरण के तीसरे चरण के रूप में स्वीकार किया जाता है। इस समयावधि में शीतयुद्ध, बर्लिन की दीवार का गिरना और सोवियत रूस का विघटन होता है। द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात सोवियत रूस और संयुक्त राज्य अमेरिका वैश्विक पटल पर दो महाशक्तियाँ उदित हुईं और इन्हीं के बीच भूमि-बँटवारे को लेकर 1945 से 1991 तक शीतयुद्ध चलता रहा। सोवियत संघ अपनी सीमा से लगे पोलैंड पर अधिकार चाहता था जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका इसके लिए राजी नहीं था। एक ओर अमेरिका की पूंजीवादी और दूसरी ओर रूस की साम्यवादी विचारधारा भी मेल नहीं खा पा रही थी। कालांतर में 9 नवंबर 1989 को बर्लिन की दीवार ढहने को प्रतीकात्मक रूप में शीतयुद्ध का अंत मान लिया गया। इसी के साथ ही अमेरिका की व्यावसायिक विस्तारवादी, पूँजीवाद और वैश्वीकरण की नीति के चलते जहाँ एक ओर अमेरिका का वर्चस्व बढ़ता गया वहीं दूसरी ओर वैश्वीकरण की प्रक्रिया को भी पंख लग गए। सोवियत रूस के विघटन के बाद अमेरिकी-यूरो पूँजीवाद को बेतहाशा छूट मिल गयी। कहना न होगा कि इन्हीं परिस्थितियों ने वैश्वीकरण की प्रक्रिया को भी धार दिया। 1990 से लेकर अब तक के समय को वैश्वीकरण के चौथे चरण के रूप में जाना-समझा जाता है। भारत इसी चौथे चरण में वैश्वीकरण से सीधे तौर पर जुड़ता है। यहाँ तक आते-आते अमेरिकी-यूरो के नीयत की कलई खुल जाती है और वैश्वीकरण, अमेरिकीकरण के पर्याय के रूप में उभरकर सामने आता है। अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक समझौतों, नियमों-क़ानूनों और नीति-निर्धारण के लिए जनवरी 1995 में ‘विश्व व्यापार संगठन’ (डब्लूटीओ) अस्तित्ववान हुआ। इसके माध्यम से वैश्विक पटल पर व्यापार व वाणिज्य के क्षेत्र में अमेरिका का एकछत्र राज्य हो गया। वैश्वीकरण की नीति को लागू करने वाले देशों को अमेरिका कहे कि अमुक नीति लागू करो तो वे करेंगे और कहे कि अमुक नीति को न लागू करो तो वे कदापि नहीं करेंगे। उदारीकरण के कारण अमेरिकी डॉलर मजबूत होता गया और इस नीति को अपनाने वाले विकासशील देशों की मुद्रा का अवमूल्यन होता गया। इसी के चलते मैक्सिको, ब्राज़ील, मलेशिया, दक्षिणी कोरिया, इंडोनेशिया, थाईलैंड और फिलीपींस जैसे न जाने कितने देशों की अर्थव्यवस्था चरमरा गयी है। जो देश अमेरिकी वर्चस्व को नकारते हैं, उन्हें वह आतंकी करार देता है। चीन, जापान और कोरिया की उभरती हुई अर्थव्यवस्था उसे चुभ रही है। इराक द्वारा अमेरिका और डॉलर को नजरअंदाज करके यूरो अपनाने पर वह पूँजीवादी-साम्राज्यवादी अमेरिका के निशाने पर आ गया। अब जहाँ तक बात भारतीय संदर्भ में उदारीकरण के ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की है तो वह निर्विवाद रूप से ’90 के बाद मानी जाती है। सर्वसम्मति से 1991 में रहे भारत के प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव को उदारीकरण के जनक माना जाता है। उन्होंने तत्कालीन वित्तमंत्री मनमोहन सिंह के साथ आर्थिक क्षेत्र में उदारीकरण की नीति अपनाकर वैश्वीकरण के लिए दरवाज़े खोल दिए।

भारतीय संस्कृति भी वैश्वीकरण के प्रभाव से अछूती नहीं रही है। या यह कहें कि संस्कृति ही सर्वाधिक प्रभावित और परिवर्तित हुई है तो संभवतः अत्युक्ति न होगी। भारतभूमि पर प्रारम्भ से ही विभिन्न जातियों, विभिन्न धर्मों और विभिन्न समुदायों का आगमन होता रहा है और इन जातियों, धर्मों और समुदायों की संस्कृति से भारतीय संस्कृति की टकराहट होती रही है। कभी-कभी तो इस टकराहट ने बड़े-बड़े आन्दोलनों को भी जन्म दिया है। जैसा पूर्व में भी उल्लेख किया जा चुका है कि उदारीकरण के द्वार से वैश्वीकरण भारत में प्रवेश करता है। उदारीकरण के कारण कहीं-न-कहीं निजीकरण और पूँजीवाद को अतिशय बढ़ावा मिला। फलतः बाज़ारवादी व्यवस्था अस्तित्ववान हुई और बाज़ारवादी व्यवस्था की कोख से उपभोक्तावादी संस्कृति ने जन्म लिया। इस बाज़ारवादी व्यवस्था ने लगभग सभी वर्गों तक अपनी पैठ बनाई है और भोगवादी संस्कृति को जन्म दिया है। पढ़े-लिखे मध्यवर्ग, संभ्रांत वर्ग और बौद्धिक वर्ग को इसने सर्वाधिक शिकार बनाया है। वस्तुतः प्रत्येक देश को अपनी सभ्यता, रहन-सहन, खानपान, इतिहासबोध, मूल्य, नैतिकताओं, परम्पराओं, देशप्रेम और अतीत की गौरवशाली महान विभूतियों के प्रति आदर और स्वाभिमान का भाव होता है। कहना न होगा कि भारत इस मामले में सबसे अग्रणी रहा है। लेकिन बीते दिनों वैश्वीकरण का एक नया षड्यंत्र सामने आया है। यह अमेरिकी नव उपनिवेशवाद एकध्रुवीय और महाशक्तिशाली बने रहने की धुन में इतना मदमाती हो गया है कि ‘विचारधारा का अंत’, ‘इतिहास का अंत’ और ‘ईश्वर का अंत’ जैसी घोषणाओं की साजिश करके तीसरी दुनिया (विशेषकर भारत) की गौरवशाली संस्कृति का ख़ात्मा करने की मंशा रखता है। उपभोक्तावादी संस्कृति की इस साजिश का शिकार होकर मध्य और बौद्धिक वर्ग अपने देश की परम्परा, संस्कृति, इतिहास, संस्कार और सभ्यता को दरकिनार कर उपभोक्तावाद द्वारा परोसी गयी भोगवादी संस्कृति को अपना रहा है। इसके कारण वह अपनी परम्पराओं से न तो जुड़ पाता है और न ही लाभान्वित हो पाता है। जब उसने ‘परम्परा का अंत’, ‘इतिहास का अंत’ मान ही लिया तो कहाँ रही परम्परा और कहाँ रहा इतिहास? इस प्रकार यह मध्य और बौद्धिक वर्ग यूरो-अमेरिका द्वारा प्रचारित-प्रसारित की जाने वाली तथाकथित ‘नई’ बातों को वास्तव में ‘नई’ मान लेने की भूल कर बैठता है। अब रहना तो उसे भारत में है लेकिन वह संचालित हो रहा है उपभोक्तावादी संस्कृति से। फलतः उसके मन में अन्तर्द्वन्द्व पनपने लगता है। एक संस्कृति को न तो वह पूर्णतः छोड़ पाता है और न ही दूसरी संस्कृति को पूर्णतः अपना ही पाता है। सैद्धांतिक स्तर पर भले वह भारतीय मूल्यों, मान्यताओं को थोड़ा-बहुत स्वीकार करता हो (क्योंकि पुराने संस्कार इतनी आसानी से जाते नहीं) लेकिन व्यवहार रूप में उसकी परिणति नहीं दिखती। और इस प्रकार वह खण्डित व्यक्तित्व और अन्तर्द्वंद्वों से भरा जीवन जीने के लिए अभिशप्त हो जाता है।

ध्यातव्य है कि भारतीय संस्कृति और उपभोक्तावादी संस्कृति के सम्मिलन से एक प्रकार का सांस्कृतिक कचरा उत्पन्न हुआ है, जिसे ‘अपसंस्कृति’ की संज्ञा से अभिधीत किया गया है। यह अपसंस्कृति न केवल समाज अपितु राज्य के लिए भी खतरनाक है। कारण यह कि इसने समाज और राज्य के अन्तर्सम्बन्धों को भी क्षीण कर दिया है। इससे जनता और सत्ता के बीच दूरियाँ बढ़ी हैं। उपभोक्तावादी संस्कृति ने मीडिया के प्रभुत्व को बढ़ा दिया है। चूँकि यह उपभोक्तावादी संस्कृति विज्ञापनतंत्र से ही फलती-फूलती है इसलिए इसने मीडिया को अपना माध्यम बनाया है। न केवल प्रिन्ट, इलेक्ट्रॉनिक अपितु सोशल मीडिया को भी इसने प्रचार-प्रसार का साधन बना लिया है। आज का मीडिया सत्ता की तूती बोलता हुआ प्रतीत हो रहा है। उसे जनता और सत्ता के बीच माध्यम बनना था। जनता की बात सत्ता तक और सत्ता की बात जनता तक पहुँचाना था, लेकिन आज वह केवल सत्ता की ही सुना रहा है। उसने जनता की सुनना बंद कर दिया है और सत्ता की बोलना शुरू कर दिया है। उदारीकरण के बाद अंतरराष्ट्रीय बहु कंपनियों को अपने उत्पाद के विज्ञापन के लिए मीडिया की ज़रूरत थी। इसीलिए तमाम चैनल्स का सोता बह निकला, जो इस उपभोक्तावादी संस्कृति को बढ़ाने में सहायक हुआ। मीडिया के इस चरित्र पर कवि-आलोचक राजेश जोशी ने इन शब्दों के माध्यम से कटाक्ष किया है – “हिंदी की बात करें तो हिंदी का प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया साहित्य और संस्कृति के प्रति सबसे ज़्यादा दोगला है। जब तक अन्य चैनल नहीं आये थे, दूरदर्शन के पास साहित्य और संस्कृति के लिए थोड़ा समय था।….. लेकिन हिंदी के अन्य चैनलों के पास ऐसी कोई समझ या उत्सुकता नज़र नहीं आती। सच तो यह है कि उनकी व्यावसायिकता उन्हें इजाजत नहीं देती।”(6) यह उपभोक्तावादी संस्कृति पूर्व प्रचलित संस्कृति को प्रतिस्थापित कर उत्पादों के ब्रांड की संस्कृति को प्रतिष्ठित करती है। इसी को प्रभा खेतान ने अपनी पुस्तक ‘भूमंडलीकरण : ब्रांड संस्कृति और राष्ट्र’ में ‘ब्रांड संस्कृति’ कहा है।

समकालीन भारतीय साहित्य में अस्मितावादी विमर्शों के उदय में कहीं-न-कहीं वैश्वीकरण का ही प्रदेय रहा है। बाज़ारवाद ने ‘मुख्यधारा’ जैसी काल्पनिक और आत्ममुग्ध धारा को जन्म दिया, जिससे गरीब, आदिवासी, स्त्री, दलित, ग्रामीण और अन्य तमाम जनजातियाँ जुड़ नहीं पायीं। बाजार ने इन हाशिये के लोगों की आर्थिक स्थिति सुधारी, जिससे इनमें अपनी अस्मिता और अस्तित्व को लेकर चेतना जागृत हुई। जिसकी अभिव्यक्ति साहित्य में होती है। “यह सच है कि भूमण्डलीकरण ने आर्थिक उदारवाद को बढ़ावा देकर आर्थिक गैर-बराबरी, जातिगत भेदों, पितृसत्ता एवं रूढ़िवाद को बढ़ावा देने में अपनी भूमिका अदा की है वहीं उसके अंदर इन प्रवृत्तियों को कुछ सीमा तक रोकने की भी क्षमता है, जरूरत उसे सही दिशा देने की है।”(7)

उपर्युक्त विवेचना के आधार पर निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि भारत में वैश्वीकरण, उदारीकरण के द्वार से प्रवेश करता है। उदारीकरण की अवधारणा को वैश्वीकरण की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में जाना-समझा जा सकता है। वैश्विक गतिविधियों का सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव भारतीय समाज पर भी पड़ता रहा है। इस वैश्वीकरण ने जहाँ एक ओर आर्थिक स्तर को सुधारा है, कंपनियों की ‘मोनोपोली’ समाप्त की है, रोज़गार के अवसर प्रदान किये हैं, उद्योग-धंधों के द्वार सभी के लिए खोल दिए हैं, जीवनस्तर को सुधार दिया है, सुख-सुविधाओं में वृद्धि करके जीवन को आसान बनाया है और वैज्ञानिक व तार्किक सोच को बढ़ावा दिया है तो वहीं दूसरी ओर अपसंस्कृति, पारिवारिक विघटन, पर्यावरण-असंतुलन, मूल्यहीनता, संवेदनशून्यता, पूँजी का अतिशय महत्त्व, हाशियाकरण, लूट और हिंसा आदि को भी प्रश्रय दिया है। तथापि वैश्वीकरण का श्याम पक्ष, उसके श्वेत पक्ष की उज्ज्वलता की तुलना में ज़्यादा स्याह है।

संदर्भ:-

  1. सिंह, सच्चिदानंद. (2016). भूमंडलीकरण की चुनौतियाँ. नयी दिल्ली : वाणी प्रकाशन. पृ. सं. 9
  2. काबरा, कमल नयन.(2018). भूमण्डलीकरण के भँवर में भारत. नयी दिल्ली : प्रकाशन संस्थान. पृ. सं. 46
  3. कुमार, राकेश.(2014). उत्तर उपनिवेशवाद : चुनौतियाँ और विकल्प. दिल्ली : शुभदा प्रकाशन. पृ. सं. 14
  4. खेतान, प्रभा.(2014). भूमंडलीकरण : ब्रांड संस्कृति और राष्ट्र. नई दिल्ली : सामयिक प्रकाशन. पृ. सं. 15
  5. सिंह, पुष्पपाल.(2015). भूमंडलीकरण और हिंदी उपन्यास. नई दिल्ली : राधाकृष्ण प्रकाशन. पृ. सं. 24
  6. उपाध्याय, रमेश व उपाध्याय, संज्ञा.(सं.).(2010). बाजारवाद और नयी सृजनशीलता. नयी दिल्ली : शब्द संधान प्रकाशन. पृ. सं. 29
  7. अग्रवाल, नीरू. (सं.). (2017). भूमण्डलीकरण और हिंदी उपन्यास. दिल्ली : अनन्य प्रकाशन. पृ. सं. 8