ISSN NO: 2581-8074 मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान की अन्तर्राष्ट्रीय शोध पत्रिका (Multidisciplinary) Peer Reviewed Journal

'विश्वप्रपंच’ की भूमिका और भारत बोध

डॉ. आलोक कुमार सिंह
शोध आलेख

हिंदी साहित्य के इतिहास का विहगावलोकन करने से यह स्पष्ट होता है कि औपनिवेशिक सांस्कृतिक दुष्प्रचार के प्रतिकार एवं जातीय परम्परा के युगानुकूल संशोधन हेतु भारतेंदु युग में पनपी ‘स्वत्व-चिंता’ द्विवेदी युग तक आकर जातीय अस्मिता के निर्माण के महाउद्यम में परिणत हो जाती है। निर्माण के इस महाउद्यम के कई मोर्चे थे और हिंदी के बौद्धिक विद्वान अपने-अपने ढंग से इसमें योग कर रहे थे। ‘स्वत्व-चिंता’ से प्रेरित हिंदी बौद्धिकों के प्रयत्न भारत बोध के ही निर्धारण के प्रयत्न कहे जा सकते हैं। निश्चय ही, अनुवाद एक साधन के रूप में इस पूरी प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा था।1 तेजस्विनी निरंजना ने बताया है कि किस प्रकार पाश्चात्य विद्वानों, प्रशासकों और मिशनरियों ने औपनिवेशिक काल में साम्राज्यवादी उद्देश्यों से भारतीय साहित्य का अनुवाद किया था। उनका सुझाव है कि उत्तर-औपनिवेशिक समाजों को अब अनुवाद का उपयोग प्रतिरोध और रूपांतरण के लिए करना चाहिए।2 द्विवेदी युगीन हिंदी बौद्धिकों के अनुवाद-प्रयत्नों में हम वस्तुतः यही प्रवृत्ति पाते हैं। इस पृष्ठभूमि में आचार्य रामचंद्र शुक्ल द्वारा अनूदित ग्रंथ ‘विश्वप्रपंच’ की भूमिका में निहित भारत बोध की पड़ताल की जा सकती है।

भारतेंदु युगीन आदर्श रामचंद्र शुक्ल को आकर्षित करते हैं। उन्होंने अपने साहित्येतिहास में लिखा है “विदेशी अंधड़ों ने उनकी आंखों में उतनी धूल नहीं झोंकी थी कि अपने देश का रूपरंग उन्हें सुझाई ही न पड़ता।… प्राचीन और नवीन के संधिस्थल पर खड़े होकर वे दोनों का जोड़ इस प्रकार मिलाना चाहते थे कि नवीन प्राचीन का प्रवर्धित रूप प्रतीत हो न कि ऊपर लपेटी हुई वस्तु।”3 भारतेंदु ने अपने प्रसिद्ध ‘बलिया व्याख्यान’ (‘भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है’) में ब्रिटिश शासन की मनमानी पर व्यंग करने के साथ-साथ भारतीय समाज की रुढ़ियों और दोषपूर्ण जीवनशैली को भी उद्घाटित किया था। फलतः ‘देशोपकार’ की भावना से प्रेरित युवा रामचंद्र शुक्ल ने जानबूझकर तत्कालीन शासकों की भाषा अंग्रेजी में ‘व्हाट हैज इंडिया टू डू’ (‘भारत को क्या करना चाहिए’) नामक लेख लिखकर आह्वान किया- “दरअसल हमें समाज सुधारक, राजनीतिक आंदोलनकर्ता, कवि और शिक्षाविद इन सबकी एक ही साथ, एक ही समय में जरूरत है।”4 इस लेख में सामाजिक कुप्रथाओं को दूर करने तथा राजनीतिक शिक्षा, उद्योग एवं तकनीकी शिक्षा की आवश्यकता पर बल देते हुए उन्होंने निर्भीक स्वर में कहा कि ‘साम्राज्यवाद ही भारत में ब्रिटिश राष्ट्र की नीति की प्रेरक शक्ति रहा है।’ इस लेख के अंत में स्वदेशी आंदोलन का उल्लेख करते हुए वे कहते हैं- ‘मेरे देशवासियों, जो इलाज आपने खोजा है, वही एकमात्र इलाज है, उसे दृढ़ता से पकड़े रहिए। इस प्रकार रामचंद्र शुक्ल का भारत बोध युवावस्था में ही रूपाकार ग्रहण करता प्रतीत होता है। इसके प्रेरक तत्त्व हैं साम्राज्यवाद का विरोध, जातीय परम्परा के प्रति स्वाभिमान और इसका युगानुकूल संशोधन, वैज्ञानिक चेतना का प्रसार और सांस्कृतिक गौरव की पुनर्प्रतिष्ठा। भाषा, साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, धर्म-दर्शन-विज्ञान आदि से संबंधित उनकी समस्त मौलिक एवं अनूदित कृतियां इसी सुचिंतित भारत बोध की प्रस्तुति और प्रसार-आग्रह की परिचायक हैं।

जर्मनी के विख्यात जीव विज्ञानी अर्न्स्ट हैकल की पुस्तक का जोसेफ मैककैब द्वारा अंग्रेजी में ‘द रिडल ऑफ द यूनिवर्स ऐट द क्लोज ऑफ द नाइनटिंथ सेंचुरी’ शीर्षक से 1900 ई. में अनुवाद किया गया था। हैकल की इस कृति में विज्ञान बनाम धर्म-दर्शन-अध्यात्म के द्वंद के विभिन्न पहलुओं की प्रस्तुति के साथ-साथ सृष्टि और जीवन संबंधी विभिन्न धार्मिक-आध्यात्मिक अटकलबाजियों को विकासवाद के सिद्धांत द्वारा खंडन किया गया था। शुक्लजी ‘विश्वप्रपंच’ के वक्तव्य में लिखते हैं– “जिस समय यह ग्रंथ प्रकाशित हुआ यूरोप में इसकी धूम सी मच गई।….इस पुस्तक ने सबसे अधिक खलबली पादरियों के बीच डाली जिनकी गालियों से भरी हुई सैकड़ों पुस्तकें इसके प्रतिवाद में निकलीं।” 5 शुक्लजी द्वारा अनुवाद हेतु इस कृति के चयन का एक कारण यह तो है ही, कृति के चयन का अन्य कारण भी महत्वपूर्ण है। हैकल ने विभिन्न संस्कृतियों-परंपराओं की तुलना के क्रम में भारतीय परम्परा की विरासत को सकारात्मक रूप में प्रस्तुत किया था। अतः एक पाश्चात्य विद्वान द्वारा ही तर्क और तथ्य आधारित ढंग से पश्चिमी श्रेष्ठता को चुनौती दिया जाना शुक्लजी को अपने उद्देश्यों के अनुरूप लगा और उन्होंने हैकल की इस कृति का हिंदी में 1920 ई.में अनुवाद किया।

शुक्लजी ने अनूदित कृति का शीर्षक ‘विश्वप्रपंच’ रखा है। वस्तुतः उन्होंने शीर्षक के शाब्दिक अनुवाद की जगह मूल कृति में उद्घाटित धार्मिक वितंडावाद की छलनाओं को अपने शीर्षक का आधार बनाया है। इस प्रकार ‘विश्वप्रपंच’ शीर्षक हिंदी नवजागरण की भांतिभंजक प्रवृत्ति के साथ-साथ आचार्य शुक्ल के उद्देश्य और लक्ष्य दोनों को स्पष्ट कर देता है। उल्लेखनीय है कि ‘विश्वप्रपंच’ के मूल संस्करण (सं. 1977, नागरीप्रचारिणी सभा) का अनूदित अंश 152 पृष्ठों का है जबकि शुक्लजी की अपनी भूमिका 155 पृष्ठों की है। यह विद्वतापूर्ण भूमिका हैकल के बाद तक की वैज्ञानिक प्रगति का लेखा-जोखा तथा इन सबका भारतीय ज्ञान परम्परा से साम्य-वैषम्य प्रस्तुत करती है। इसके महत्व पर सर्वप्रथम डॉ. रामविलास शर्मा ने अपनी पुस्तक ‘आचार्य रामचंद्र शुक्ल और हिंदी आलोचना’ के द्वितीय संस्करण (1959 ई.) की भूमिका में विचार किया है। डॉ. मैनेजर पांडे ने लिखा है- “डॉ रामविलास शर्मा ने जैसे महावीर प्रसाद द्विवेदी के ‘संपत्तिशास्त्र’ को नया जीवन दिया उसी तरह रामचंद्र शुक्ल के ‘विश्वप्रपंच’ को भी।” 6

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपनी भूमिका में आधुनिक भौतिकशास्त्र, जीवशास्त्र, विकासवाद, भौतिकवाद और भाववाद या अध्यात्मवाद के पक्षों के विभिन्न तर्कों का उल्लेख किया है। प्रसंगानुसार रसायनशास्त्र, भूगर्भशास्त्र आदि अन्य विज्ञानों का भी जिक्र आया है। उनकी इस भूमिका में संसार के प्रति मानव के दार्शनिक दृष्टिकोण का हल विज्ञान के अध्ययन द्वारा प्रस्तावित किया गया है। उन्होंने उन्होंने 19वीं सदी में वैज्ञानिक प्रगति के साथ मनुष्य के संसार संबंधी प्राचीन विचारों में बदलाव को लक्ष्य किया है- “जहाँ पहले लोग छोटी से छोटी बात के कारण को न पाकर उसे ईश्वर की कृति मान संतोष कर लेते थे वहाँ चारों और नाना विज्ञानों के द्वारा कार्य कारण की ऐसी विस्तृत श्रृंखला उपस्थित कर दी गई कि किसी को बीच ही में ठिठकने की आवश्यकता न रह गई। ज्ञानदृष्टि को बहुत दूर तक बढ़ाने के लिए मार्ग खुल गया।“7 धार्मिक विश्वासों के अनुसार हर परम्परा के लोग समझते थे कि जीवो की योनियाँ ईश्वर की रची हुई हैं और ऐसा सृष्टि के आरंभ से चला आ रहा है। शुक्लजी बताते हैं कि “इस विकासवाद से बड़ी खलबली मची। इसकी बात जनसाधारण के विश्वास और धर्मपुस्तकों की पौराणिक सृष्टि-कथा के विरुद्ध थी। हमारे यहाँ भी पुराणों में योनियों स्थिर कही गई हैं और उनकी संख्या भी चौरासी लाख बता दी गई है। गरुडपुराण में तो प्रत्येक वर्ग की योनियों की गिनती तक है। डारविन ने यह अच्छी तरह सिद्ध करके दिखा दिया कि एक जाति के जीवों से ही क्रमशः दूसरी जाति के जीवों की उत्पत्ति हुई है।”8 गौरतलब है कि ये पौराणिक अंधविश्वास या रुढ़ियां पश्चिम को ही नहीं, बल्कि भारतीय समाज को भी जकड़ी हुई थीं जिस पर शुक्लजी चोट करते हैं। यह ध्यान देने की बात है कि ‘विश्वप्रपंच’ के प्रकाशन की एक सदी बीत जाने के बाद भी आज का हिंदी या भारतीय समाज कितना रुढिमुक्त या अंधविश्वासमुक्त हो सका है।

‘विश्वप्रपंच’ की भूमिका में विकासवाद के प्रसंग में शुक्लजी लिखते हैं- “विकास नियम की चरितार्थता पहले सजीव सृष्टि (जंतु और वनस्पति) में ही दिखाई गई। फिर वैज्ञानिकों ने उसे लेकर संपूर्ण जगत विधान पर घटाया और नाना रूपों के पदार्थों को एक ही मूल रूप के द्रव्य से उत्तरोत्तर उत्पन्न सिद्ध किया। इस प्रकार विकास एक विश्वव्यापक नियम माना जाता है। नाना मतों और संप्रदायों की पौराणिक सृष्टि कथाओं का इस सिद्धांत से सर्वथा विरोध है। वे इस विकासवाद के अनुसार असंगत ठहरती हैं…।”9 वे जीवन के विभिन्न अनुशासनों पर विकासवाद के प्रभाव को स्वीकारते हुए कहते हैं- “जगत की उत्पति, जीवों की उत्पत्ति, मनोविज्ञान, कर्तव्यशास्त्र, इतिहास, धर्माधर्म, समाजशास्त्र सब की व्याख्या विकास पद्धति का अवलंबन करके की गई है। “10 ‘सभ्य संसार का भावी धर्म’, ‘धर्म का विकास’ और ‘भक्ति का विकास’ नामक उनके निबंध विकासवादी दृष्टि से धर्म और भक्ति को समझने और संशोधित करने का प्रस्ताव करते हैं। शुक्लजी का ‘लोकधर्म’ और ‘लोकमंगल’ भी वस्तुतः विकासवाद से प्रेरित है। उनकी समाज संबंधी धारणा विकासवाद से प्रभावित है। “‘विश्वप्रपंच’ की भूमिका में उन्होंने प्राचीन भारतीय समाज से शुनःशेप, उद्दालक और श्वेतकेतु, दीर्घतमस, कुंती आदि के दृष्टांतों के माध्यम से यह दिखाया है कि किस प्रकार भारतीय समाज असभ्यता से सभ्यता की ओर विकसित हुआ।” 11 हालाँकि शुक्लजी का जाग्रत बोध या विवेक डार्विन के विकासवाद में अंतर्निहित ‘योग्यतम की उत्तरजीविता’ के सिद्धांत को नहीं स्वीकारता। वे इस अवधारणा में निहित भक्षण वृत्ती या यांत्रिक तटस्थता के पक्ष में नहीं, बल्कि मानवीय पक्षधरता के विश्वासी हैं। यह तर्क एक प्रकार से ‘श्वेत श्रेष्ठता’ के नस्लीय दावों और युगीन साम्राज्यवादी शक्तियों के वर्चस्व को वैधता प्रदान करने वाला था। शुक्लजी मनुष्यता के संतुलित विकास के पक्ष में हैं और इसके लिए हड़प या हिंसा की प्रवृति के बजाय समरसता, सामंजस्य और सहयोग के हिमायती हैं। ध्यातव्य है कि माल्थस के प्रभाव से डार्विन ने प्राणीजगत में संघर्ष और योग्यतम के जीने का जो सिद्धांत अपनाया था, उसका शुक्लजी के विवेचन में अभाव है। वे स्पेंसर की ‘परस्पर साहाय्य’ की प्रवृत्ति का उल्लेख करते हैं जिसका उत्कर्ष वे ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के भाव में बताते हैं।

ईश्वर संबंधी धारणाओं के प्रति शुक्लजी जी इस भूमिका में कहते हैं “सब मतों और संप्रदायों में धर्म और ईश्वर की जो सामान्य भावना है उसी का पक्ष अब शिक्षित पक्ष के अंतर्गत आ सकता है। ईश्वर साकार है कि निराकार, लंबी दाढ़ी वाला है कि चार हाथ वाला, अरबी बोलता है कि संस्कृत, मूर्ति पूजने वालों से दोस्ती रखता है कि आसमान की ओर हाथ उठाने वालों से, इन बातों पर विवाद करने वाले अब केवल उपहास के पात्र होंगे।”12 अपनी सुदीर्घ भूमिका में विभिन्न दार्शनिक मतों एवं अद्यतन वैज्ञानिक प्रगति का सारांश प्रस्तुत कर लेने के बाद वे कहते हैं- “अब जिन्हें मैदान में जाना हो वह नाना विज्ञानों से तथ्य संग्रह करके सीधे उस सीमा पर जाएँ जहाँ दो पक्ष अड़े हुए हैं- एक ओर आत्मवादी, दूसरी ओर अनात्मवादी; एक ओर जडवादी, दूसरी ओर नित्य चैतन्यवादी। यदि चैतन्य की नित्य सत्ता सर्वमान्य हो गई तो फिर सब मतों की भावना का समर्थन हुआ समझिए क्योंकि चैतन्य सर्वस्वरूप है। नाना भेदों में अभेद दृष्टि ही सच्ची तत्वदृष्टि है। इसी के द्वारा सत्य का अनुभव और मतमतान्तर के रागद्वेष का परिहार हो सकता है।”13 दरअसल ‘नाना भेदों में अभेद दृष्टि’ पदबंध आचार्य शुक्ल के भारत बोध को समझने की कुंजी है। इसमें कोई शंका नहीं कि शुक्लजी नित्य चैतन्य सत्ता या ब्रहा को मानते हैं। वे जगत को ब्रह्म की अभिव्यक्ति मानते हैं; लेकिन एक बार जब वे जगत या लोक में आते हैं तो किसी भी अलौकिक, दिव्य, नित्य चैतन्य सत्ता का हस्तक्षेप स्वीकार नहीं करते। आचार्य शुक्ल अपने इस लोकवाद या वस्तुजगतवाद के सहारे ‘रस’ को तमाम प्रकार के शास्त्रीय मकड़जाल से मुक्त करते हुए जागतिक आधार पर प्रतिष्ठित करते हैं।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपनी इस विद्वतापूर्ण भूमिका में और अनूदित पाठ की पाद टिप्पणियों में भी पाश्चात्य परम्परा और भारतीय परम्परा के विभिन्न विद्वानों के मतों का उल्लेख किया है। उन्होंने पाश्चात्य परम्परा से शेफर, हक्सले, हैकल, लॉर्ड केल्विन, सर विलियम क्रुक्स, ह्यूम, मिल, डार्विन, हरबर्ट स्पेंसर, ऑलिवर लॉज, प्रो. बेटसन, देकार्त, कांट, फिक्ट, बर्कले, हीलिंग, शोपेनहावर आदि तथा भारतीय परम्परा से वैशेषिक, न्याय, तैत्तिरीयोपनिषद, गरुडपुराण, योगदर्शन, पतंजलि, चरक, सांख्य, वेदांत, चार्वाक, शंकर भाष्य, ऋग्वेद, केनोपनिषद, वेदव्यास आदि के मतों को उद्धृत और विश्लेषित किया है। कई उदाहरणों में, जैसे कि आधुनिक परमाणु सिद्धांत और वैशेषिक दर्शन के प्रसंग में, शुक्लजी भारतीय प्राचीन दार्शनिक परम्परा के विज्ञान सम्मत तत्वों का उद्घाटन करते हैं और आधुनिक वैज्ञानिक स्थापना से उसका अंतर भी स्पष्ट कर देते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि अपनी दार्शनिक या जातीय परम्परा के प्रति उनकी अंधभक्ति नहीं है, बल्कि कई उदाहरणों में विज्ञान सम्मत विवेक दृष्टि से वे उसकी कमियाँ भी गिनाते हैं, आलोचना भी करते हैं। डॉ रामविलास शर्मा ने ‘विश्वप्रपंच’ की भूमिका में निहित शुक्लजी की विचार-दृष्टि के आधार पर लिखा है- “ईमानदारी का यह तकाजा जरूर है कि शुक्लजी अपने युग के हिंदी अहिंदी विचारकों से कितना आगे थे और उनकी विचारधारा कितनी वैज्ञानिक है इसे अब हम स्वीकार करें। “14

‘विश्वप्रपंच’ की भूमिका और अनूदित पाठ में शुक्लजी की पाद टिप्पणियाँ अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। ये पाद टिप्पणियों अनुवादकीय स्पष्टीकरण से अधिक एक चिंतक की चिंतन है। शुक्लजी का अनुवाद-उद्देश्य नवजागरण परक वृहतर महाउयम के उद्देश्यों से परिचालित होता है। इसमें यदि एक और ज्ञानवर्धन का उद्देश्य था तो दूसरी ओर भारत के शाश्वत पिछड़ेपन की उपनिवेशवादी व्याख्याओं के बरक्स भारतीय संस्कृति की श्रेष्ठता सिद्ध करने की ललक भी थी। इसलिए अपनी पाद टिप्पणियों में वे भारतीय परम्परा से तुलनात्मक साक्ष्य प्रस्तुत और विवेचित करते चलते हैं। महत्वपूर्ण यह है कि वे अपनी परम्परा के नकारात्मक तत्वों की आलोचना भी करते हैं। परम्परा का युगानुकूल संशोधन उनके भारत बोध का अनिवार्य तत्त्व है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल द्वारा ‘विश्वप्रपंच’ का अनुवाद जातीय भाषा की सृजनात्मकता को भी प्रमाणित करने का प्रयत्न है। उस युग में पारिभाषिक शब्दावली का रूप-स्थिरीकरण तो दूर की बात है, इसका निर्माण तक नहीं हो पाया था। शुक्लजी के इस मौलिक प्रयत्न हेतु उनकी तुलना बेकन से की गई।15 वस्तुतः ‘विश्वप्रपंच’ की पारिभाषिक शब्दावली का ऐतिहासिक महत्व है। वैज्ञानिक- दार्शनिक अंग्रेजी शब्दों के हिंदी प्रतिरूपों का निर्धारण समयसाध्य एवं श्रमसाध्य तो रहा ही होगा, बुद्धिसाध्य भी कम नहीं रहा होगा। प्रतिरूपों के निर्धारण के लिए शुक्लजी ने मुख्यतः संस्कृत का आश्रय लिया है। उन्होंने पुराने शब्दों में भी नई अर्थवता भर दी है, जैसे ‘केमिस्ट्री’ के लिए ‘रसायन’ शब्द का प्रयोग। वे पारिभाषिक शब्द निर्माण के क्रम में वैज्ञानिक पद्धति का अनुपालन करते हैं। वैज्ञानिक द्विनाम पद्धति पर निर्धारित उनके प्रतिरूपों का उदाहरण द्रष्टव्य है- Canis familiarizes श्वकुक्कुर (पालतू कुत्ता), Canis aureus श्ववृक् (भेडिया) Canis lupus श्वजंबुक (गीदड़), Canis vulpes श्वलोमशा (लोमड़ी)। 16 उचित प्रतिरूप की तलाश में शुक्लजी अपनी परम्परा को खंगालते हैं। उदाहरण के लिए, ‘ऑर्गेनिक’ और ‘इनॉर्गेनिक’ शब्दों के हिंदी प्रतिरूप ‘सेंद्रिय’ और ‘निरिन्द्रिय’ उन्होंने चरक से लिए लिए हैं- ‘सेंद्रिय चेतनं द्रव्य निरिन्द्रियमचेतनम्। शब्द-चयन हेतु वे अपनी लोक परम्परा के पास भी जाते हैं। ऐसे कुछ शब्द हैं पतंगा, छुछमछली, बनमानुस, लजालू आदि।

हालाँकि ‘विश्वप्रपंच’ की भूमिका में, और अनूदित पाठ में भी, कहीं-कहीं इतर परंपराओं के प्रति शुक्लजी का पूर्वग्रह खटकता है। तमाम वैज्ञानिक दार्शनिक प्रतिपादनों के बीच समाहित शुक्लजी के सुचिंतित भारत बोध में अपनी जातीय परम्परा के प्रति अतिरिक्त लगाव या पक्षधरता को महसूस किया जा सकता है। हालाँकि इसे सांस्कृतिक अस्मिता की लड़ाई के परिप्रेक्ष्य में प्रतिक्रियात्मक ही माना जा सकता है, स्वाभाविक नहीं। निश्चय ही, पुनरान्वेषण और ‘निर्माण’ के तयुगीन प्रयत्नों की अपनी सीमाएँ हैं और इसे स्वीकार करना शुक्लजी के प्रति किसी प्रकार की कृतघ्नता न होगी। ये सीमाएँ वस्तुतः युग-संक्रमण की प्रक्रिया में उत्पन्न मूल्य-संक्रमण का ऐतिहासिक साक्ष्य हैं। यदि शुक्लजी ने अध्यात्मवाद का विरोध किया तो आज यह देखना रोचक होगा कि उनके बाद रहस्यवाद, ज्योतिष और भाग्यवाद तथा कर्मकांड आदि में लोगों का विश्वास आज कितना घटा या बढ़ा है। इस प्रवृत्ति के अलावा हमें यह भी समझने की आवश्यकता है कि समकालीन भारत में पूंजीवादी साम्राज्यवाद के परिवर्तित रूपों उपभोक्तावादी उपनिवेशवाद, बौद्धिक उपनिवेशवाद आदि वैश्विक प्रवृत्तियों से सचेत रहते हुए, आत्महीनता की मनोवृत्ति को त्याग कर तथा अपनी जातीय परम्परा से जुड़कर किस प्रकार एक स्वस्थ भारत बोध अर्जित किया जा सकता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल का समग्र चिंतन इस प्रक्रिया में एक संदर्भ-बिंदु की भूमिका निभा सकता है। नामवर सिंह ने बिल्कुल सही कहा है- “जिस सेकुलरिज्म का आज बहुत गुणगान किया जाता है और कभी-कभी विकृत रूप में उसे लागू करने की कोशिश की जाती है वह उदार दृष्टि धार्मिक अंधविश्वासों को, रुढ़ियों को हटाकर एक समन्वित जातीय, राष्ट्रीय दृष्टिकोण कैसे हो सकती है इसके बीज आप ‘विश्वप्रपंच’ की भूमिका में देख सकते हैं।“17

डॉ. आलोक कुमार सिंह

असिस्टेंट प्रोफ़ेसर, डी.सी. कॉलेज, हाज़ीपुर, बिहार

घोषणाः प्रस्तुत शोध आलेख मेरा मौलिक प्रयत्न है।

डी. सी. कॉलेज, हाजीपुर, बिहार

संदर्भ संकेतः

  1. ‘तत्कालीन हिन्दी बौद्धिकों द्वारा अनुवाद के माध्यम से हिन्दी साहित्य को समृद्ध करने हेतु रचे गए ‘भांडार’ के रूपक की चर्चा फ्रैसेस्का ओरसिनी ने भी की है। द्रष्टव्य- ‘What Did They Mean by ‘Public’?: Language, Literature and the Politics of Nationalism”, Frencesca Orsini, EPW, Vol. 34, No. 7, 409-416
  2. Siting Translation: History, Post-Structuralism and the Colonial Context, Tejaswini Niranjana, University of California Press, 1992
  3. हिन्दी साहित्य का इतिहास’, आचार्य रामचंद्र शुक्ल ग्रंथावली, भाग- 5. सं. ओमप्रकाश सिंह, प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली, 2007, पृ. 363
  4. ‘भारत को क्या करना चाहिए, आचार्य रामचंद्र शुकान ग्रंथावली, भाग- 4. सं. ओमप्रकाश सिंह, प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली, 2007,पृ. 131-135
  5. प्रथम संस्करण का वक्तव्य, विश्वप्रपंच, आचार्य रामचंद्र शुक्ल संथावली, भाग ६. सं. ओमप्रकाश सिंह, प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली, 2007
  6. नया मानदंड, अंक 31 जनवरी-मार्च 2004, पृ. 29
  7. भूमिका, ‘विश्वप्रपंच’, पू. 7
  8. वहीं, पृ. 19
  9. वहीं, पृ. 44
  10. वही. पू. 53
  11. वही, पू. 54-55
  12. वही, पृ. 81-82
  13. वही, पृ. 82 14
  14. ‘आचार्य रामचंद्र शुक्ल और हिन्दी आलोचना’, रामविलास शर्मा, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 1993, पृ. 26
  15. ‘आचार्य रामचंद्र शुक्ल का गद्य-साहित्य’, अशोक सिंह, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 1981, पृ. 184
  16. The Riddle of the Universe, Ernst Haeckel, Translated by Joseph McCab, London, 1929, 7. 59: ‘विश्वप्रपंच’, पृ. 116
  17. आचार्य रामचंद्र शुक्ल और हिन्दी नवजागरण, आलोचक के मुख से, सं. खगेन्द्र ठाकुर, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2005, पृ. 60