सूर्यकांत त्रिपाठी अपनी ‘सरोज स्मृति'(1935) कविता में लिखते हैं; ‘मैं कवि हूं,पाया है प्रकाश’ जो इस बात का संकेत करती है कि कविता, कवि तथा प्रकाश के मध्य एक मधुर संबंध होता है। कविता एक ओर जहां पाठक को अपने समय के प्रति सचेत करती है वहीं दूसरी ओर उसे सन्मार्ग पर चलने के लिए उद्वेलित भी करती है। इस तरह कविता अपने एकाकी दृष्टि में तो केवल ‘कला के कर्तव्य’ का निर्वहन कर रही होती है लेकिन इसके समानांतर वह सामाजिक सुधार जैसे महत्वपूर्ण कार्य भी कर रही होती है।
कुमार अंबुज कविता व कवि के उपर्युक्त सिद्धांतों पर खरे उतरने वाले महत्त्वपूर्ण समकालीन कवि हैं।1988 में उनकी कविता ‘किवाड़’ के लिए उन्हें भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार मिला और इसी नाम से इनकी पहली कविता संग्रह 1992 में छपी। कुमार अंबुज की कविता में विषयों की विविधता है, शोषित वर्ग के प्रति गहरी संवेदना है,अपनी जड़ों के प्रति आभार है,जीवन के प्रति गहरी आस्था है और एक लेखकीय जिम्मेदारी का सत्यनिष्ठ निर्वहन भी। उनकी भाषा में प्रयुक्त बिम्बों में पैनापन है प्रतीकों में धार है और भाषा में तेजी है।’खाना बनाती स्त्रियां’ नामक कविता में वे लिखते हैं…
“आपने उन्हें सुंदर कहा तो उन्होंने खाना बनाया और डायन कहा तब भी
उन्होंने बच्चे को गर्भ में रखकर खाना बनाया फिर बच्चे को गोद में लेकर
उन्होंने अपने सपनों के ठीक बीच में खाना बनाया
तुम्हारे सपनों में भी बनाती रही खाना”
कुमार अंबुज समकालीन हिंदी साहित्य के प्रतिनिधि कवि हैं। कुमार अंबुज के कवि दृष्टि की पहुंच स्थूल विषयों के साथ-साथ सूक्ष्म से सूक्ष्मतर विषयों तक है यह उनके काव्य में प्रयुक्त विषयों के वैविध्य व बिम्बों के वैचित्र्य व गहनता से प्रमाणित होता है। कुमार अंबुज के बारे में विचारते हुए ‘विष्णु खरे’ लिखते हैं…
“कुमार अंबुज की खूबी यह भी है कि उनमें एकतानता नहीं है।कुछ अंतरंग रस की कविताओं में भी वे शहर ले आते हैं वे उस बॉलर की तरह है जो बहुत कम लूज बॉल करता है और हर गेंद में एक्शन, रफ्तार, फ्लाइट, लंबाई, स्पिन, डायरेक्शन, दूसरा आदि की एक न एक बारीक वैरिएशन हासिल कर लेता है।”
कुमार अंबुज अपनी कविताओं में पाठकों से एक साथ संवाद स्थापित करते करते उसी के बीच एक महत्त्वपूर्ण बात कह जाते हैं जो पाठक के मन को कुरेद जाती है। ‘भरी हुई बस में लालसाफे वाला आदमी’ नामक कविता में वे लिखते हैं…
“पूछना चाहता है लालसाफे वाला आदमी
जब वोट डालने के लिए चलना पड़ता है
सिर्फ दो मील
तो इलाज कराने के लिए बीस मील क्यों?”
ग्रामीण जीवन की याद और शहरों की ओर पलायन का दुःख उनकी कविताओं में सहजता से आता है। शहरी होने की विवशता में भी गांव की धड़कन उनकी कविताओं के हृदय में धड़कती रहती है। ‘जरा सी देर में’ कविता में वे लिखते हैं…
“नौकरी खोजते हुए भूल गया मैं
गेहूं-चने के खेत
मेथी की भाजी और एक कोस
दूर कुएं का पानी”
कवि अपने समय की अनुभूतियों से गढ़ा जाता है। कुमार अंबुज की कविता में उनका समय अपने पूरे अवकाश (स्पेस) के साथ अभिव्यक्त होता है। एलपीजी सुधारों और उनकी जड़ों को भारत-भू पर फैलते हुए कुमार अंबुज ने देखा है और प्रत्यक्षतः अनुभूत किया है निश्चित ही इन सुधारों का एक पहलू यह भी है कि इनसे ‘इंडिया’ और ‘भारत’ के बीच का अंतर बढ़ा है। ‘नींद और नींद के बाहर’ कविता में वे लिखते हैं…
“झर रहे हैं अनाज के दाने
भूख का सपना
नींद के चमकदार सूप में झड़ रहा है
और दानों के फटके जाने की आवाज पूरे ब्रह्मांड में
गूंज रही है।
नदी एक आंसू है पृथ्वी की गाल पर बहता हुआ।”
मध्यवर्ग की चिंता भी कुमार अंबुज के काव्य में पर्याप्त जगह पाती है। मध्य वर्ग जो प्राइवेट अस्पतालों की भारी भरकम फीस को वहन करने में सक्षम नहीं है, वहीं सरकारी अस्पतालों की दुर्दशा भी उसे निढाल बना रही है। ‘असाध्य रोग’ नामक कविता में कुमार अंबुज लिखते हैं…
“आंसुओं से कोई दवा तैयार हो सकती होती तो
कोई रोग असाध्य नहीं रह जाता।”
कुमार अंबुज की कविताएं बहुत बार सीधा निष्कर्ष नहीं देती। वह पाठक की साहचर्यता व उसके पाठकीय दायित्व पर विश्वास करती हुई पाठक के लिए खुला अवकाश छोड़ती हैं ताकि पाठक भी कुछ देर लेखक की अनुभूतियों के साथ समय गुज़ारे व कविता के मायने तलाशे। ‘जब दोस्त के पिता मरे’ नामक कविता में लिखते हैं…
“बारिश हो रही थी जब दोस्त के पिता मरे
भीगते हुए निकली शवयात्रा बारिश की वजह से नहीं
आए ज्यादा लोग
जो कंधा दे रहे थे एक तरफ से भीग रहे थे कम
सबसे पहले बारिश होती थी दोस्त के पिता पर।”
उपभोक्तावाद,बाजारीकरण व नगरीकरण की संस्कृति ने उत्तरोत्तर मनुष्य को खोखला ही बनाया है। टारगेट पूरा करता हुआ आदमी अपना ही जीवन जीने के लिए अपने बॉस के परमिशन का गुलाम है। हर तरह से बेचैन व पराजित मनुष्य इसी तरह जीने के लिए अभिशप्त है। ‘इधर का जीवन कविता’ में कुमार अंबुज लिखते हैं…
“इधर का जीवन हो गया है कुछ ऐसा
कि हर पन्द्रह मिनट बाद
टटोलकर ढूंढनी होती है जीवन की धड़कन।”
कुमार अंबुज की कविता में एक बेचैनी साफ तौर पर देखी जा सकती है। यह बेचैनी भले ही उनके व्यक्तिगत अनुभूतियों और अतीत की स्मृतियों से संचित हो किंतु इस बेचैनी में एक तरह की सार्वजनिकता भी है जिस कारण इनकी कविता महत्त्वपूर्ण हो जाती है।’रात तीन बजे’ कविता में वे लिखते हैं…
“एक आवाज आती है
रात तीन बजे की नींद में
यह कुएं में बाल्टी डूबने की आवाज है
या बिल्ली बगल की छत पर कूद गयी है
या कि एक औरत ने अपना रोना तेजी से रोक लिया
है”
रात तीन बजे की नींद (जिसमें पूरी दुनिया मगन होकर सोती है) में कवि को आवाज़ आना उसकी बेचैनी का द्योतक है। यह बेचैनी व्यर्थ नहीं है बल्कि एक जिम्मेदार देश के जिम्मेदार नागरिक की बेचैनी है। अतः इस तरह की बेचैनी हर नागरिक में होनी चाहिए और रात के तीन बजे उसे नींद में एक आवाज़ आनी चाहिए जिससे यह भान हो सके कि वह सही मायने में अपने आसापास की दुनिया में जीवित भी है। एक औरत के द्वारा रात के तीन बजे अपना रोना तेजी से रोक लेने में इस देश की सारी औरतों की पीड़ा छिपी हुई है जिसमें एक सामाजिकबोध भी है,जिस कारण वह अपने रोने की आवाज के कारण किसी की नींद बचा लेने की भी कोशिश करती हुई दिखाई देती है।
अंबुज की कविता में पुरानी चीजों के प्रति एक जुड़ाव भी दिखाई देता है और वे झूठे आधुनिकताबोध से ग्रसित नहीं होना चाहते। यह आधुनिकता की होड़ में एक जागृत कवि के पिछड़ जाने का प्रतीक नहीं है बल्कि आधुनिकता की कुरूपता को त्यागकर अपनी जड़ों में जीवित रहने की कोशिश का प्रतिफल है। ‘किवाड़’ कविता में वे लिखते हैं…
“इन किवाड़ों पर चंदा सूरज और
नागदेवता बने हैं
एक विश्वास और सुरक्षा खुदी हुई है इन पर
इन्हें देखकर हमें पिता की याद आती है
भैया जब इन्हें बदलवाने को कहते हैं
मां दहल जाती हैं और
कई रातों तक पिता उनके स्वप्नों में आते हैं
जब ये नहीं रहेंगे
घर घर नहीं रहेगा”
पूंजीवादी दौर में वस्तुएं केवल धन का प्रतिस्थापन हैं। उनके प्रति कोई श्रद्धाभाव नहीं है जबकि भारतीय संस्कृति में चीजों के साथ भी जो निर्जीव ही क्यों न हों एक लगाव है, एक जुड़ाव है। इसके पीछे एक गहरा दर्शन है जो सहअस्तित्व की बात करता है। वर्तमान समय में जब अलग-अलग सांचों में नये डिजाइन के अंतरर्राष्ट्रीय दरवाजे गढ़े जा रहे तब कवि का किवाड़ बचा लेने की संघर्ष उस हर छोटी-छोटी चीजों को बचा लेने के संघर्ष का द्योतक है। किवाड़ केवल लकड़ी का बना एक सांचा भर नहीं है बल्कि जब घर का मुखिया सुबह-सबेरे अर्थोपार्जन के लिए निकलता है तो इन्हीं किवाड़ों की ओट से घर के बच्चे शाम को उसके आने की राह तकते हैं। इस घर में जो कोई भी जो कुछ भी आता है इन्हीं किवाड़ों से आता है। मामा भी।
अपने अतीत की स्मृतियां बार-बार कवि की कविता में उभरती हैं। ऐसा लगता है कि उन्होंने अपने अतीत को भले ही औरों की तरह एक प्रवाह और अनजानेपन में गुजार दिया हो लेकिन अपनी आज की स्मृतियों में अतीत की हर घटना को व्यवस्थित तरीके से संजोया है जिससे वर्तमान में वे खुद भी सीख लेते रहते हैं और आज की पीढ़ियों के लिए उस अवसर की उपलब्धता की संभावना भी पैदा कर पाते हैं जो कवि अपने खुद के जीवन में नहीं जी पाया और जिसे आज की नई पौध को अवश्य जीना चाहिए। ‘जरा सी देर में’ कविता में वे लिखते हैं…
“जरा सी देर में बड़ा हो गया मैं
और गांव के सिवान से बाहर निकल आया
शहर की लड़की से प्यार किया
और जरा सी देर में वह लड़की
लिपिस्टिक की दुनिया में गायब हो गयी
जरा सी देर में मैं शराब पीने लगा
कॉलेज की आखिरी साल की परीक्षा से भाग आया
नौकरी खोजते हुए भूल गया मैं
गेहूं चने के खेत मेथी की भांजी और
एक कोस दूर कुएं का पानी”
उपर्युक्त कविता में कवि अपनी पूरी जीवन यात्रा को जरा सी देर में ही खत्म कर देते हुए दिखाई देते हैं। यह जीने की जल्दबाजी नहीं है बल्कि विस्तारपूर्वक जीवन जीने का दर्शन है। जीवन सच में बहुत क्षणिक है। बचपन, युवावस्था, गृहस्थी से वृद्धावस्था कब आ जाता है पता नहीं चलता। महत्त्वपूर्ण बात यह नहीं है बल्कि महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इस छोटे से जीवन को भी यदि सलीके से जिया जाए तो यह बड़ा बन सकता है। सलीके से जीने के लिए हमें जीवन को जीवंतता प्रदान करने वाली चीजों में विश्वास करना होगा। जीवन को जीवंत शहर, शराब, लिपिस्टिक, नौकरी आदि नही बल्कि गेहूं-चने के खेत, मेथी की भाजी और कुंए का पानी बनाते हैं। बस खुद इनमें विश्वास रखिए और दुनिया को ढर्रे पर जीने दीजिए या आगाह करते रहिए।
वर्तमान समाज और जीवन में प्रचलित क्रूरता के बारे में भी कुमार अंबुज ने खुलकर लिखा है। इस समय और इस देश में जब भातृत्व भाव,समरसता और सामासिक संस्कृति के उन्नयन का समय है तब हम लड़ रहे हैं। दूसरों को नीचा दिखाने की हरसंभव कोशिश में लगे हुए हैं। इस बीच शायद हम यह भूल रहे हैं कि हम जिस चीज के बने हैं वह ह्रासमान है। हमारी देह के रक्त और मांस-मज्जाएं जिस चमकदार चमड़े से ढकी हुई हैं, वह एक दिन झूल जाता है। उसमें झुर्रियां पड़ जाती हैं और एक दिन वह मिट्टी में मिल जाता है। रुपयों से अब तक ऐसी किसी दवा का आविष्कार नहीं किया जा सका है जो व्यक्ति को अमरता प्रदान करे। ऐसी कोई शल्य-चिकित्सा नहीं है जिसमें मृत्यु का आपरेशन हो और जीवन प्रदान किया जाय। ‘एक दीवार पर दो तलवारें देखकर’ कविता में कुमार अंबुज लिखते हैं…
“ये तलवारें उजड़ चुके वैभव का चमकदार दुःख हैं
रात की गहन चुप्पी में इनकी मूठों से
कराह और रोने की मिली जुली आवाज आती है
कुछ घुड़सवारों के कटे हुए हाथ
तलवारों को रातभर भांजते हैं
यह पूरी दीवार इन तलवारों के सहारे है
अगर हट गई ये तलवारें तो
भरभराकर गिर पड़ेगा यह घर
फिलहाल इनके लोहे पर जंग लग चुका है
और धार पड़ गयी है भोथरी इतनी कि
नहीं काटा जा सकता इनसे एक आलू भी”
कुमार अंबुज की कविता दृष्टि का दायरा केवल अपने हमउम्र गृहस्थों की बेचैनियों, अपने जी चुके युवा अतीत के प्रति आत्मीयता और वर्तमान जनजीवन की समस्याओं तक ही नहीं है बल्कि उनका विमर्श वृद्धजनों के जीवन को भी छूता है और कवि की परानुभूति उनके दुःखों को भी महसूस करती हुई उन्हें सान्त्वना देती प्रतीत होती है। कई बार सान्त्वना, कुछ करने से भी अधिक जरुरी होती है। ‘दो बूढ़ी स्त्रियों का मिलन’ कविता में वे लिखते हैं…
“वे सीधे एक दूसरे के गले लग जाती हैं
उनकी आंखों में मोतियाबिंद के धुंधले आंसू चमकते हैं
वे कुछ नहीं बोलती बहुत देर तक
चिपटाए रहती हैं खुद से खुद को
उनकी विधवा पीड़ा बेहद समान बहुत पारदर्शी होती है
उनकी भाषा शब्दविहीन दुखों की भाषा होती है।”
कुमार अंबुज की कविता में नश्वरताबोध भी खुलकर सामने आता है। इनके नश्वरताबोध का दायरा काफी विस्तृत है और यह केवल जीवित प्राणियों तक ही सीमित नहीं है अजीवितों, पुरातनपंथी परंपराओं, किलों और इतिहास की नश्वर परिणति भी अंबुज की कविताओं में दिखाई देती है। ‘किला’ नामक कविता में वे लिखते हैं…
“जिस झरोखे से एक-दूसरे को चूमते हुए
राजा रानी सूर्यास्त देखते थे
वहां पुरातत्व के इंजीनियर ने ‘खतरा’ लिख दिया है
दरकी हुई मीनारों का रंग गहरा काला हो गया है
जिधर बाग था उधर एक लंबी डरावनी घास है
रात में इधर चोर डाकू भी नहीं आते
और दिन में इस किले को देखने के लिए
लगता है सिर्फ एक रुपया।”
शिल्प की दृष्टि से भी कुमार अंबुज की कविता अमूल्य है। उनकी भाषा में आने वाले शब्द अपने विशेष मायनों के साथ आते हैं जो पाठक से विशेष साहचर्य की मांग करते हैं। कुमार अंबुज द्वारा प्रयुक्त बिम्ब मन मस्तिष्क में छपते जाते हैं। प्रतीक योजना कविता की गूढ़ता के रहस्य खोलती हुई कविता की सार्थक दिशा का आश्वासन देती है। ‘बारात’ कविता में लिखते हैं…
“रास्तों पर बनते जा रहे हैं
चक्कों की निशान
लौट रही है बैलगाड़ियों पर
गांव की बारात
पीतल कांसे के बर्तन
निवाड़ का पलंग
बछड़े वाली गाय और
टीन की एक संदूक पर दहेज लेकर।”
इस तरह अंबुज की कविताओं में जीवन की धड़कन है, अतीत के प्रति आत्मीयता आभार व सीख है, अपनी संस्कृति के प्रति दायित्वबोध, जिसे कविता के माध्यम से ही सही बचाने का आह्वान वे हम सब से करते हैं। समकालीन कविता की धारा कुमार अंबुज की कविताओं से मजबूत हुई है। जीवन में विश्वास को बल मिला है और प्रेम की विश्वसनीयता भी बढ़ी है।
संदर्भ :-
काव्य संग्रह (कुमार अंबुज)-
- किवाड़ (1992), राधाकृष्ण प्रकाशन
- क्रूरता (1996), राधाकृष्ण प्रकाशन
- अनन्तिम (1998), राधाकृष्ण प्रकाशन
- अतिक्रमण (2002), राधाकृष्ण प्रकाशन
- अमीरी रेखा (2011), राधाकृष्ण प्रकाशन
- उपशीर्षक (2022), राधाकृष्ण प्रकाशन
- कवि ने कहा (2012), किताबघर प्रकाशन
- प्रतिनिधि कविताएं (2014), राजकमल प्रकाशन
- थलचर डायरी विधा (2016), कुमार अंबुज, राधाकृष्ण प्रकाशन
- मनुष्य का अवकाश, लेख संग्रह, कुमार अंबुज, सेतु प्रकाशन
- इच्छाएं (2008), कहानी संग्रह कुमार अंबुज राधाकृष्ण प्रकाशन
- कविता के नये प्रतिमान (1968), नामवर सिंह राजकमल प्रकाशन ।