लोकभारती प्रकाशन से सन् 1970 ई. में प्रकाशित ‘कामायनी का पुनर्मूल्यांकन’ डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी की एक उत्कृष्ट आलोचनात्मक कृति है। जिसमें उन्होंने छायावाद के आधार स्तंभ माने जाने वाले कवि जयशंकर प्रसाद की कालजयी रचना ‘कामायनी’ का गंभीर अध्ययन कर, उन पर उठने वाले प्रश्नों का सामाधान प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। इस पुस्तक के शीर्षक का आपना एक विशेष अर्थ है। कहने का तात्पर्य यह है कि ‘कामायनी का पुनर्मूल्यांकन’ शीर्षक में ‘पुनर्मूल्यांकन’ का एक विशिष्ट अर्थ है – ‘फिर से मूल्याकंन’। यहाँ फिर से मूल्य आँकना से अभिप्राय सिर्फ रचना के महत्व को फिर से उजागर करना नहीं है, बल्कि रचना के साथ-साथ उस पर की गई आलोचना-प्रत्यालोचना को स्पष्ट कर उसमें फैले भ्रम का निराकरण करना है और साथ ही साथ तत्कालीन सामाज और साहित्य में उसके महत्व की स्थापना है। डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी जी का मानना है कि साहित्य में पुनर्मूल्यांकन की बात तब होती है जब किसी कवि, रचना या युग विशेष को देखने-परखने में ‘गुणात्मक अंतर’ आ जाए। यहाँ ‘गुणात्मक अंतर’ से अभिप्राय – अब तक एक कृति को जिन बाह्य पक्षों से देखा गया है, उनसे हटकर उसमें निहित गुणों के आधार पर उसकी नवीनता को दर्शाते हुए उसके महत्व का आकलन करना है। पुनर्मूल्यांकन किसी रचना, रचनाकार या युग विशेष को समझने की नयी दृष्टि देता है। इस पुस्तक में डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी जी ने ‘कामायनी’ में प्रसाद के श्लाघ्य पक्षों की ओर विद्वानों एवं पाठकों का ध्यान केन्द्रित करने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया है।
‘कामायनी’ प्रसाद के सात-आठ वर्षों के परिश्रम का फल है, जिसमें उनके जीवन भर का अनुभव समाहित है। जो किसी एक कथा को लेकर आगे नहीं बढ़ती, बल्कि की द्वयर्थक कथा कहती है। यानी प्रसाद जी ने पौराणिक कथा को आधार बनाकर मानव संस्कृति के निर्माण और विकास की कथा को प्रस्तुत किया है और साथ ही साथ अतिबौद्धिकता, अतिभौतिकता और अतियांत्रिकता से उत्पन्न समस्याओं से आधुनिक मानव को आगाह किया है। कहा जाता है कि – “कला और साहित्य की जो कृति किसी समाज, संस्कृति और अस्मिता का निर्माण करती है, उन सबको पहचानने, समझने में मदद करती है, वह कालजयी होती है।” ‘कामायनी’ के संदर्भ में यह बात उचित ही जान पड़ती है। वह समग्रता को अपने में समेटे हुए है। कदाचित इसीलिए डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी ‘कमायनी’ के संदर्भ में लिखते हैं कि-“ ‘कामायनी’ हर आधुनिक समीक्षक, और रचनाकार के लिए परिक्षा स्थल है।”
यह आलोचनात्मक कृति मुख्यतः तीन अध्यायों में विभक्त है। जिसमें डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी ने विभिन्न विद्वानों के मतों से हमारा परिचय कराते हुए अपने मौलिक चिन्तन को अभिव्यक्ति दी है।
प्रथम अध्याय इस पुस्तक का महत्त्वपूर्ण भाग है जिसमें डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी जी ने ‘कामायनी’ के सभी पक्षों को स्पर्श किया है। उनका मानना है कि “पुनर्मूल्यांकन एक साथ ही रचना और प्रचलित समीक्षा दृष्टि दोनों का होता है।” इसीलिए उन्होंने अपने इस अध्याय में प्रसाद कृत ‘कामायनी’ पर ही नहीं, बल्कि उसके संबंध में विभिन्न विद्वानों के मतों पर भी विचार किया है। हिन्दी जगत में ‘कामायनी’ के बाह्य पक्षों पर चर्चा अधिक हुई है, परन्तु आन्तरिक पक्षों की ओर विद्वानों का ध्यान बहुत कम गया है। इसी आन्तरिक पक्ष को ध्यान में रखकर डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी ने ‘कामायनी’ के ‘गुणात्मक अंतर’ को उजागर किया। उनकी दृष्टि में ‘कामायनी’ को समझने की अब तक की पद्धतियाँ रही हैं – “महाकाव्य के रूप में, रूपक के रूप में, ऐतिहासिक इतिवृत के रूप में, दार्शनिक रचना के रूप में या ऐसे ही कुछ अन्य पक्षों को आधार बनाकर। पर कामायनी को महाकाव्य की दृष्टि से देखना या उसके चरित्रांकन की व्यख्या करना, उसमें रस की स्थापना करना या रूपक पर बल देना या उसके दर्शन को महत्त्व देने लगना आधुनिक हिंदी काव्य की एक महत्त्वपूर्ण रचना के वैशिष्ट्य को अनदेखा करने का सफल प्रयत्न है।” यानी चतुर्वेदी जी कामायनी में निहित वैशिष्ट्य के उजागर पर अधिक बल देते हैं। हिंदी के कुछ विद्वान वर्षों से चली आ रही भारतीय परंपरा में प्रचलित महाकाव्य के लक्षणों की कसौटी पर रख कर ‘कामायनी’ को परखते हैं, जिसका परिणाम यह निकलता है कि ‘कामायनी’ भारतीय परंपरा में प्रचलित महाकाव्य के ढ़ाँचे में फिट नहीं बैठती है। कुछ विद्वानों की दृष्टि में यह ‘कामायनी’ की सबसे बड़ी त्रुटि है। यही कारण है कि उसे विभिन्न विद्वानों के आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। ‘कामायनी’ की यह त्रुटि ही उसकी अपनी मौलिक और नवीन विशेषता है, जो उसे अपने पुर्ववर्ती महाकाव्यों से भिन्न रूप प्रदान करती है। विद्वानों के इस रूढ़ दृष्टि पर तंज कसते हुए डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी लिखते हैं कि- “तो महाकाव्य के रूप में किसी रचना को जाँचने में बराबर यह हुआ है कि जिन रूढ़ियों को कवि ने तोड़ा है उन्हें बलात् ढूँढ़ने की कोशिश की जाय, और पूरी रचना के जिस विशिष्ट विधान को उसने विकसित किया है, उसे नजरअंदाज कर दिया जाय।” ऐसा ही कुछ ‘कामायनी’ के साथ भी हुआ है। अतः यह अपनी विशिष्ट रचना विधान के कारण ही अपने पुर्ववर्ती महाकाव्यों से भिन्न है। जैसे महाकाव्य में आठ सर्ग होने चाहिए, पर कामायनी में पन्द्रह सर्ग है। महाकाव्य का नायक धीरोदात्त गुणों से परिपूर्ण होता है जबकि ‘कामायनी’ के नायक में इसका अभाव दिखता है। इसके प्रारम्भ में मगंलाचरण, सज्जन प्रशंसा और दुर्जन निन्दा आदि भी नहीं है। साथ-ही-साथ महाकाव्य किसी एक व्यक्ति, एक वंश या एक जाति की जीवन गाथा लेकर चलती है जबकि कामायनी समस्त मानवता के विकास की कथा कहती है। यह हिंदी साहित्य के महाकाव्य की परंपरा में एक युगांतकारी बदलाव है। जिसे डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी जी ने अपने इस आलोचनात्मक कृति में चिन्हित किया है। इसी बात को पुष्ट करते हुए डॉ. भोलानाथ तिवारी भी लिखते हैं कि-“छायावाद का प्रथम और अंतिम माहाकाव्य ‘कामायनी’ माहाकाव्यों की परंपरा में एक नूतन अध्याय जोड़ता है। पुर्व प्रचलित महाकाव्यों से अनेक बातों में भिन्न होने के कारण आचार्यों द्वारा निर्मित महाकाव्यों की कसौटी इस सोने की परख करने में असमर्थ है। लक्षण-ग्रंथ बनाए जाते हैं, लक्ष्य ग्रंथों के आधार पर। जब ऐसे लक्ष्य-ग्रंथ थे ही नहीं, तो इसे बाँध पाने वाले लक्षण बनते कैसे?”
महाकाव्यत्व के अतिरिक्त ‘कामायनी’ के रूपक तत्व, ऐतिहासिकता, दार्शनिकता पर भी चतुर्वेदी जी ने विचार किया है। वैसे तो ‘रूपक’ शब्द के कई अर्थ है, परन्तु कामायनी में यह द्वयर्थक कथा के रूप में प्रयुक्त हुई है। मूलतः कामायनी एक साथ दो कथाओं को लेकर चलती है। कामायनी में मनु की कथा के साथ-साथ मानवता के विकास की अन्तरकथा भी आगे बढ़ती है। डॉ. चतुर्वेदी इन दोनों कथाओं को एक साथ जोड़ कर देखने की बात करते है। पर समस्या तो यह है कि इसे अलग-अलग रूप में ही देखा गया है। इसीलिए वे कहते है कि –“यहाँ भी ‘कामायनी’ के सूक्ष्म विधान की यह विशेषता नहीं समझी जाती कि – कामायनी की रचना दो अर्थ-स्तरों पर जरूर चलती है। पर अर्थ के ये दोनो स्तर परस्पर एक दूसरे से संश्लिष्ट हैं, इसीलिए एक विराटतर अर्थ की सृष्टि करते हैं।” यहाँ ‘विराटतर अर्थ’ से उनका तात्पर्य मानव संस्कृति के निर्माण और विकास से है।
जहाँ तक ‘कामायनी’ में ऐतिहासिकता का प्रश्न है तो हम यह कह सकते हैं कि कोई भी कला या कृति इतिहास से पुरी तरह पृथक नहीं होती है। प्रत्यक्ष रूप से न सही पर परोक्ष रूप से तो उसका जुड़ाव इतिहास से होता ही है। रचना के पात्र और कथा इतिहास सम्मत भले ही न हो, परन्तु इतना तो अवश्य है कि वह तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों से हमें अवगत अवश्य कराते हैं। ‘कामायनी’ की कथा पौराणिक है एवं उसके पात्र मिथकीय चरित्र है। परन्तु घटनाएँ इतिहास सम्मत जान पड़ती है, विशेषतः ‘जल प्लावन’ की घटना। भूगर्भ अध्येताओं ने भी इस बात की पुष्टि की है और इस घटना को ईसा से कई सौ वर्ष पहले की मानते है। पाश्चात्य विद्वान डॉ.ट्रिकलर का मानना है कि- “बालू से दबे हुए प्राचीन नगरों के खण्डहरों को देखने से ऐसा ज्ञात होता है कि हिमालय प्रदेश में कभी न कभी जल प्रलय अवश्य हुई थी।” प्रसाद जी ने पौराणिक कथा और मिथकीय चरित्रों के माध्यम से सृष्टि के विकास के इतिहास को प्रतिकात्मक ढ़ग से प्रस्तुत किया है। इतिहास और मिथकीय कथा को आधार बनाकर प्रसाद जी ने ‘कामायनी’ में अपने स्वतंत्र विचारों को अभिव्यक्ति दी है। अतः यह दोनो मिलकर ‘कामायनी’ में युग सत्य और जीवन सत्य को वाणी देते हैं। इस दृष्टि से देखा जाय तो डॉ. भगवान सिंह ने उचित ही कहा है- “कोई भी रचनाकार किसी ऐतिहासिक, पौराणिक या मिथकीय कथानक को उनका पुनराख्यान करने के लिए नहीं चुनता, अपितु अपने युगसत्य और जीवनसत्य को व्यक्त करने के लिए उनका चुनाव खास तौर से इसलिए करता है कि वह इनकी स्थानगत और कालगत दूरी का लाभ उठाकर कुछ अधिक स्वतंत्रता से अपने विचारों को मुखर कर सकता है।” वास्तव में चतुर्वेदी जी ने अपने इस अध्याय में ‘कामायनी’ के ऐतिहासिकता के संबंध में इसी तत्व को स्थापित करने का प्रयत्न किया है। जहाँ तक ‘कामायनी’ में दार्शनिकता का प्रश्न है तो यह कहा जा सकता है कि ‘कामायनी’ में दर्शन अनिवार्य रूप से है। प्रसाद जी दर्शन के कुशल अध्येता थे। उन पर शैव दर्शन का प्रभाव परिलक्षित होता है। यही कारण है कि कुछ विद्वान अपनी इकहरी दृष्टि के कारण ‘कामायनी’ को शैव दर्शन का टीका या व्याख्या मानते हैं। काव्य में दर्शन का पुट अपने आप हो जाता है, यह अनुभव से उपजता है। जिसे अनुभूति के द्वरा समझा जा सकता है। इसीलिए डॉ. चतुर्वेदी लिखते हैं कि –“रचना में दर्शन का कोई अर्थ तभी है जब कि वह अनुभव के स्तर पर आये न कि विवेचन के रूप में।” (कामायनी का पुनर्मूल्यांकन, डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, छठा संस्करण:2003,पृष्ठ संख्या-11) जहाँ काव्य में दर्शन हावी होता है, वहाँ काव्य की प्रक्रिया लुप्त हो जाती है। कामायनी में अभिव्यक्त दर्शन प्रसाद के अनुभव का ही फल है, यह अलग बात है कि इस काव्य के अंतिम तीन सर्गों में दर्शन का विस्तार अधिक हुआ है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि यह किसी दार्शन का टीका है। कामायनी में दर्शन अनुभूति और परिस्थिति के अनुरूप उत्पन्न हुआ है। कामायनी को इन्हीं इकहरी दृष्टियों से देखा-परखा जाता रहा है। यही कारण है कि डॉ. चतुर्वेदी इस अध्याय में एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठाते हैं-“क्या आधुनिक साहित्य चिंतन की प्रक्रिया में पिछली समीक्षा पद्धति की तुलना में ऐसा कोई गुणात्मक परिवर्तन आया है?” पहले-पहल यह गुणात्मक परिवर्तन हमें मुक्तिबोध की समीक्षा में देखने को मिलता है। उनकी आलोचनात्मक कृति ‘कामायनी : एक पुनर्विचार’ को डॉ. चतुर्वेदी ‘कामायनी’ की समझ को बढ़ाने वाली महत्त्वपूर्ण कृति के रूप में स्वीकारते हैं। परन्तु उनका मानना है कि– “मुक्तिबोध की यह समीक्षा निश्चय ही विचारोत्तेजक है तथा और भी अधिक सार्थक हो पाती, यदि वे अपने मार्क्सवादी चिंतन को यहाँ अस्थान पर स्थापित करने का आग्रह न करते।” इस अध्याय में डॉ.चतुर्वेदी जी ने कामायनी की भाषा पर भी दृष्टिपात किया है। अतः इस अध्याय को इस पुस्तक का सार कहा जा सकता है।
दूसरे अध्याय में चतुर्वेदी जी ने कामायनी की रचना प्रक्रिया पर बल दिया है। वे ‘कामायनी’ के केन्द्र में तीन बातों की प्रधानता स्वीकारते हैं- पहला मानवीय संस्कृति का विकास, दूसरा उसके मान मूल्यों की प्रक्रिया और तीसरा उसके वर्तमान विभ्रमों का विश्लेषण। जैसा की कामायनी दो कथाओं को लेकर आगे बढ़ती है- एक ओर तो वह एक पौराणिक कथा कहती है, तो वही दूसरी ओर उस कथा के माध्यम से मानव संस्कृति के विकास की गाथा को सरलता से पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करती है और साथ ही साथ उस संस्कृति में फैले विभ्रमों को दूर करती है। असफलता व्यक्ति को मांजता है और उसके व्यक्तित्व को परिष्कृत कर उसे निखारता है। परन्तु आज का आधुनिक मनुष्य असफल होकर निराश होता जा रहा है और उसमें जीवन के प्रति उदासीन भाव जागृत हो रहे हैं जिसका परिणाम भयंकर निकलता है। यह मानवीय संस्कृति के लक्षण नहीं है। इस संस्कृति में संघर्ष और कर्म को विशेष महत्व दिया गया। यही कारण है कि प्रसाद निराश मनु को श्रद्धा के माध्यम से कर्म की प्रेरणा देते हैं- “एक तुम, यह विस्तृत भू- खण्ड प्रकृति वैभव से भरा अमंद। / कर्म का भोग, भोग का कर्म यही जड़ का चेतन आनन्द।” संघर्ष और कर्म दोनो एक दूसरे के पूरक है, बिना संघर्ष के कर्म फलीभूत नहीं होता है। अतः चतुर्वेदी जी का कहना उचित ही जान पड़ता है- “मानव जीवन और संस्कृति के जटिल और संश्लिष्ट रूप को प्रसाद ने कामायनी में उसी जटिलता और संश्लिष्टता में अंकित किया है, और पुनर्रचना की इस प्रक्रिया में उन्होंने हमारी समझ और अनुभव-क्षमता को समृद्धतर किया है।” किसी कृति की आलोचना करते समय समीक्षक को यह ध्यान रखना चाहिए कि उस कृति का सौंदर्य नष्ट न हो यानी कि रचना-दृष्टि विरूप न हो और न ही उस रचना की मौलिक एवं नवीन विशेषताओं को अनदेखा करके उसका विश्लेषण कर उसे एक तत्व दृष्टि के रूप में प्रतिष्ठित किया जाए। जबकि कामायनी को हमेशा वाद विशेष के घेरे में रखकर देखा गया है। जिसका परिणाम यह हुआ कि विद्वानों ने उसे एक वाद (शैवागम) के घेरे से बाहर निकालकर दूसरे वाद (मार्क्सवाद) के ढ़ाँचे में जकड़ दिया है। ‘कामायनी’ में प्रसाद का उद्देश्य किसी वाद (आनन्दवाद) विशेष की स्थापना करना नहीं है, बल्कि आधुनिक मनुष्य को उनकी समस्याओं से अवगत कराना और जीवन में सामंजस्य स्थापित करना है। डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी ने उचित ही कहा है कि- “मानव जीवन को ‘कर्म का भोग, भोग का कर्म’ की चक्रीय प्रक्रिया में पहचानने वाले कवि के लिए यह अभीष्ट नहीं कि वह किसी वाद की प्रतिष्ठा के लिए सचेष्ट हो। भारतीय पुनर्जागरण के अधिकतर मनीषियों ने इस बात की चिंता की कि उनकी जीवंत रचना दृष्टि किसी वाद के ढाँचे में न जकड़ दी जाए।” कामायनी में व्यक्त सांस्कृतिक संघर्ष पर विस्तार से विवेचन करते हुए डॉ. चतुर्वेदी जी ने प्रसाद के कर्म की तुलना गीता में कृष्ण के निष्काम कर्म से करते हुए प्रसाद के ‘कर्म का भोग, भोग का कर्म’ को मानव मनोविज्ञान के अधिक निकट और व्यवहारिक मानते हैं। यानी प्रसाद जी की दृष्टि जीवन की सहज प्रक्रिया की ओर अधिक है। उनका यह सूत्र वाक्य इसी ओर संकेत करता है। अतः उन्होंने इस अध्याय में ‘कामायनी’ को दर्शन की परिधि से बाहर निकाल कर उसे काव्य के रूप में प्रतिष्ठित किया है। दर्शन में तर्क और विवेक को विशेष महत्व दिया जाता है, जबकि काव्य में आनन्द को। दर्शन तत्व की खोज करते हुए व्यावहारिक जीवन से पृथक हो जाता है, जबकि काव्य या साहित्य जीवन के समग्र अनुभव से हमारा परिचय कराता है एवं जीवन की समग्र धारणा को स्पष्ट करता है। यही कारण है कि वे ‘कामायनी’ को दर्शन नहीं काव्य के रूप में स्वीकार करते हैं। चतुर्वेदी जी के इन विचारों का प्रभाव आगामी विद्वानों पर भी दिखाई पड़ता है।
तीसरे अध्याय में डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी ने कामायनी के भाषिक पक्ष पर स्वतंत्र रूप से विचार किया है। ‘कामायनी’ की भाषा को लेकर विद्वानों में मत भेद की स्थिति बनी हुई है। कुछ विद्वानों ने ‘कामायनी’ की भाषा संबंधी भूलों पर विचार करते हुए अनेक लेख लिखे हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि ‘कामायनी’ में भाषा संबंधी त्रुटियाँ निहित हैं, इसके बावजूद भी ‘कामायनी’ हिन्दी की श्रेष्ठ काव्य कृतियों में गिनी जाती है। यह एक उदात्त काव्य हैं और उदात्त काव्य सर्वथा दोष रहित नहीं होता। ‘कामायनी’ को लोंजाइनस के इस कथन के आलोक में देखा जा सकता है – “उत्तम प्रतिभा सर्वथा दोष रहित नहीं होती, क्योंकि पूर्ण शुद्धता का प्रयास तुच्छता में परिणत होता है। जिस प्रकार बहुत वैभवशाली एक-एक वस्तु की खोज-खबर नहीं रख सकता, उसी प्रकार बहुत प्रतिभाशाली भी एक-एक दोष के प्रति सतर्क नहीं रह सकता। संभव है कि सामान्य बुद्धि का व्यक्ति, जो ऊँचे चढने का खतरा उठाना नहीं चाहता, दोषों से मुक्त रह जाये, पर महान प्रतिभाएँ अपनी क्षमता के कारण ही, स्खलन से नहीं बच पातीं। एक प्रवृत्ति यह भी देखी जाती है कि मानवीय प्रयासों के श्लाघ्य पक्षों की ओर लोगों का ध्यान कम जाता है। दोषों की याद तो अमिट होती है, किंतु गुणों की याद तुरंत मिट जाती है।” इसमें कोई संदेह नहीं है कि प्रसाद जी ने ‘कामायनी’ के जरिए ऊँचे चढने का खतरा उठाया है, यही कारण है कि उनकी यह कृति स्खलन से बच नहीं पायी। वास्तव में यह भी सच है कि यदि प्रसाद एक-एक दोष के प्रति सतर्क होकर ‘कामायनी’ की रचना करते तो शायद ही वह हिंदी के उस उत्तुंग शिखर पर पहुँच पाती, जहाँ वह आज है। प्रसाद अपने युग की संवेदना से पूर्णतः परिचित थे, जिसे उन्होंने कामायनी में ढाला है। इसीलिए कामायनी एक उदात्त रचना के रूप में सामने आती है।
जहाँ तक भाषा का प्रश्न है तो चतुर्वेदी जी काव्य रचना में भाषा के दो स्तर मानते हैं – पहला सामान्य वर्णन की भाषा और दूसरा बिंबों की भाषा। वे काव्य में प्रयोग की जाने वाली भाषा का केन्द्रीय तत्व भावचित्र या बिंबों को मानते हैं। इसके अभाव में काव्य की भाषा सामान्य गद्य की भाषा जैसी लगने लगेगी। जिसके परिणाम स्वरूप काव्य में शिथिलता आने लगती है। बिंब एक प्रकार की वर्णन शैली है जिसके माध्यम से कवि या रचनाकार अपनी ऐन्द्रिय संवेदनाओं को मूर्त रूप प्रदान करते हैं। काव्य को भव्यता और गरिमा प्रदान करने में बिंब अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं । इसीलिए डॉ. चतुर्वेदी काव्य की अर्थवत्ता बिंबों से निर्मित मानते हैं। इस अध्याय में डॉ. चतुर्वेदी जी ने कामायनी के बिंब-भाषा पर विस्तार से विचार करते हुए उसमें प्रतीकों के माध्यम से बिंबों के विकास की प्रक्रिया को उजागर किया है। कामायनी में प्रसाद की बिंब भाषा अधिक विकसित हुई है। इस संदर्भ में डॉ. चतुर्वेदी लिखते हैं कि- “उसके बिंबों की असाधारण रचना शक्ति में उसकी सामान्य वर्णन भाषा की शिथिलता विलुप्त हो जाती है।”
‘कामायनी का पुनर्मूल्यांकन’ प्रसाद के उन श्लाघ्य पक्षों की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करती है जिन्हें दरकिनार करके उसका विश्लेषण किया जाता रहा है। यह कृति कामायनी को समग्रता में समझने पर बल देती है और प्रसाद के विशिष्ट रचना विधान को प्रकाश में लाती है। साथ ही साथ कामायनी की समझ को बढ़ाने में अपना महत्त्वपूर्ण योग देती है।
संदर्भ:-
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