अरुणाचल प्रदेश अपने नैसर्गिक, सदाबहार घाटियों, वनाच्छादित पर्वतों, बहुरंगी संस्कृति, संग्रह विरासत, बहुजातीय समाज, भाषायी वैविध्य एवं नयनाभिराम वन्य प्राणियों के कारण देश में विशिष्ट स्थान रखता है। अरुणाचल प्रदेश की जनसंख्या में सर्वाधिक हिस्सा जनजातियों का है। अरुणाचल प्रदेश में मुख्यत: 26 जनजातियां पाई जाती हैं, 100 से भी अधिक उपजनजातियां है। गालो जनजाति अरुणाचल प्रदेश की प्रमुख जनजाति है।‘मिनाम’ अरुणाचल प्रदेश के गालो जनजाति पर केन्द्रित उपन्यास है। जिसकी लेखिका मोर्जुम लोयी है। यह एक उपन्यास एक आदिवासी स्त्री के संघर्ष पर आधारित है। गालो अरुणाचल प्रदेश की प्रमुख जनजातियों में है। मिनाम उपन्यास में ‘गालो’ जनजाति की विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक मान्यताओं पर आधारित उपन्यास है। इसमें गालो जनजाति की परम्पराएँ, त्योहार, रहन-सहन, खान-पान, पूजा-अनुष्ठान, आभूषण व पोशके, शिल्प–कला, और वास्तुकला आदि तथा लोककलाएँ अपनी विशिष्टता के साथ विद्यमान है।
गालो जनजाति अरुणाचल प्रदेश के पूर्वी सियाङ, पश्चिमी सियाङ, अपर सुबनसिरी, लोअर सियाङ, और लेपारादा जिलों में निवास करती हैं। गालो जनजाति के लोग मिलनसार व्यक्तित्व, साफ-सफाई, स्वादिष्ट स्थानीय व्यंजन, और अतिथि सत्कार के लिए पहचाने जाते है। “अतिथि देवो भवः’ की संस्कृति उनमें प्रमुखता से देखी जा सकती है। ‘गालो जनजाति सर्वाधिक शिक्षित जनजातियों में शामिल है। यह लोग मंगोलियन नस्ल के, मझले कद के होते हैं। गालो लोग स्वयं को ‘आबो तानी’(आदि मानव) के वंशज मानते है । पहाड़ी प्रदेश के नाते अरुणाचल के अन्य जनजातियों की तरह गालो समुदाय का जनजीवन भी कृषि पर निर्भर है। इनकी जीवन-शैली इनकी सनातन संस्कृति का ज्वलंत उदाहरण है।
उपन्यास को इक्कीस प्रकरणों में विभाजित किया गया है प्रत्येक प्रकरण एक प्रमुख सन्दर्भ को उद्घाटित करता है। उपन्यास का पहला प्रकरण ‘अरुणाचल प्रदेश’ है जो अरुणाचल की भौगोलिक और प्राकृतिक स्थिति का वर्णन करता है साथ ही अरुणाचल के गालो समाज की सामाजिक संरचना और गालो जनजाति के संस्कृति का परिचय प्रदान करता है।
“20वीं शताब्दी के शुरू तक अरुणाचल में गाँव-गाँव के बीच युद्ध चल रहा था। उस समय गाँव को ऐसी-ऐसी जगह पर बसाया जाता था जहाँ दुश्मन आसानी से आक्रमण कर न सके-किसी पर्वत की ढलान पर अथवा किसी गुप्त घाटियों पर बसाया जाता था। गाँव के नाम को पास के बहने वाले झरने अथवा पहाड़ के नाम पर, किसी सुखद या दुःखद स्मृति में, उस गाँव में निवास करने वाले विशेष समुदाय के नाम पर अथवा किसी स्थानीय विशेषताओं पर रखा जाता था। गालो गाँवों के नाम भी इसी आधार पर हैं।”1
गालो जनजाति के लोग मुख्य रूप से गाँव में बसे हैं। गालो भाषा में गाँव के लिए ‘दोलू’ शब्द का प्रयोग है। इनकी बस्तियाँ नदियों के आस-पास ही पाई जाती है। गालो समुदाय के गाँवों और घरों की बनावट एक ही तरह की होती है। एक गाँव से दूसरे गाँव की सीमा पहाड़ियों या नदियों के जलधाराओं से निर्धारित होती है। इस सीमा के अन्दर रहकर ही वे अपनी खेती, शिकार, मकान के लिए लकड़ी एवं पत्ते एकत्रित करते हैं तथा अपनी आवश्यकता की सारी सामग्री इन्हीं जंगलों से इकठ्ठा करते हैं। इनकी सीमा के अन्दर बहने वाली नदियों की मछलियों आदि पर इनका पूर्ण अधिकार होता है। किसी अन्य गाँव के सदस्य इस पर हस्तक्षेप नहीं कर सकते। अपने गाँव की मर्यादा की रक्षा में ये लोग सदा तैयार रहते हैं। गालो समाज दुनिया के अन्य समाज से भिन्न नहीं है। यह समाज भी पितृसत्तात्मक समाज है। पिता घर के प्रधान होते हैं। घर का संचालन उसी के हाथों में होता है। घर के सारे निर्णय भी उसके द्वारा ही होता है। यह एक ऐसा समाज है जहाँ संपत्ति खासकर जमीन-जायदाद बेटों को दिया जाता है। इस समाज की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ये लोग संयुक्त परिवार में रहते हैं। प्रायः एक ही मकान में परिवार के प्रधान, उसकी पत्नी, उसके विवाहित लड़के अपनी पत्नियों के साथ, अविवाहित लड़के एवं लड़कियाँ आदि रहते हैं। घर के सारे काम- काज, खाना पकाना, जंगल से लकड़ी एवं सब्जी लाना, पालतू पशुओं, मुर्गों की देखभाल घर की औरतें करती हैं। धनार्जन करना तथा नये उपजाऊ जमीन की सफाई करना पुरुषों का काम होता है। बच्चों की देखभाल दोनों मिलकर करते हैं।
उपन्यास में ग्रामीण जीवन का चित्रण लेखिका ने ‘ईटानगर’ और ‘मोदी ग्राम’ प्रकरण में किया है। साथ ही गालो समाज में शिक्षा,स्वाथ्य,रोटी और मकान जैसी बुनियादी जरूरतों की हकीकत सामने रखी है। आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी ये मनुष्य की बुनियादी जरूरते किस प्रकार अधूरी है इसमें मात्र सरकारों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। आदमी को अपने हक के लिए स्वयं लड़ना चाहिए। जिसे हम उपन्यास की दो स्त्री पात्रों ‘यामी’ और ‘मिनाम’ के माध्यम से देख सकते है।
शिक्षा व्यवस्था की तंग हालत से लेखिका ने बड़ी गंभीरता के साथ ‘यामी’ के माध्यम से अपने पाठक को रूबरू कराने का प्रयास किया है।‘यामी’ जो ‘गवर्नमेंट कॉलेज ईटानगर’ से अपनी पढ़ाई कर रही है। यामी एक सहज, सरल और मेधावी छात्रा है और शिक्षको की प्रिय छात्र भी। यामी अपने कॉलेज द्वारा आयोजित पांच दिवसीय राष्ट्रीय सेवा योजना के कैंप में एक दूर-दराज़ के गांव में जाती है तो उसका हृदय विस्मय, दुःख और निराशा से भर जाता है उसको अपनी आंखों पर विश्वास ही नहीं होता कि यह एक गांव है वहां की हालत बिल्कुल भिन्न है न वहां शिक्षा की व्यवस्था है न ही स्वास्थ्य की। गांव में किसी के घर शौचालय नहीं हैं। जहां गांव के लोग सुअर के किए गुमिर( सुअर रखने की जगह)बनाते हैं वहीं शौच भी करते हैं और फिर उसी सुअर को खाते भी है। जिसके चलते लोगों को खतरनाक बीमारियों से जूझना पड़ता है। इस दुर्दशा का जिम्मेवार कौन?
लेखिका मोर्जुम लोयी लिखती है कि राज्य सरकार ने लगभग हर गाँव मे शिक्षा का प्रबंध कर रखा है। पर दूर-दराज इलाकों में जिस किसी भी शिक्षक को भेजते हैं, वो वहाँ रहता ही नहीं। सरकार से वेतन तो लेते हैं पर काम नहीं करते हैं। यह समस्या केवल अरुणाचल प्रदेश के ग्रामीण इलाकों की नहीं है, बल्कि पूरे देश में शिक्षा व्यवस्था का लगभग यही हाल है। समस्या के साथ-साथ,समाधान की भी चर्चा की गयी है-“तो क्या सरकार कुछ एक्शन नहीं ले सकती उनके खिलाफ? चिंतित स्वर में यामी ने पूछा। अखबारों व न्यूज चैनलों में देखना और स्वयं अपनी आँखों से देखने में बहुत अंतर है। हम पूरे भारत को एक दिन में बदल तो नहीं सकते पर अपने गाँव व कस्बों से बदलाव का आरम्भ कर सकते हैं, पर सरकार ऐसे शिक्षकों को क्यूँ कुछ नहीं कहती ? यामी चिंतित स्वर में कह उठी। किसी को पता चले तब न। अब पहली बात तो यह है कि वहाँ जाता कौन है? न ही गाँव वालों की ओर से कोई शिकायत उन तक पहुंचती है… “आञा की बात को बीच में ही काटकर यामी बोली –“क्यूं न हम स्वयं सेवकों का गठन करें और ऐसे गाँवों में जाकर अपनी सेवा दें? उन्हें शिक्षित करें ? कम से कम स्वच्छता के बारे में उन्हें बता सकते हैं।”2
‘मोदी ग्राम’ नामक प्रकरण में गालो जनजाति के ग्रामीण इलाकों, जीवन शैली, और उनके घरों की बनावट तथा घरों के प्रत्येक स्थान के महत्व को बताया गया है। मोदी ग्राम जो यामी का गांव है। मोदी अर्थात् पहाड़। पहाड़ को वहां ‘दीते’ भी कहते हैं।गालो जनजाति के घरों की बनावट अलग तरह की होती है इनके घर बांस के बने होते है। तथा घरों के प्रत्येक स्थान का अलग मतलब होता है। गालो समाज में घर चार दिशाओं व कोनों में विभाजित किए जाते हैं,- ञोदे में घर के बड़े-बुजुर्ग अर्थात् दादा-दादी, बागों में पिता या घर के मर्द, उदु में लड़कियां तथा ञोसी में घर की अन्य वह महिला जिसके ऊपर घर की सारी जिम्मेदारियां हैं,जैसे–खाना आदि बनाना। उदाहरण के लिए-
‘कोबा’ (सीढ़िया) के महत्व को – घरो में दो कोबा अर्थात् मर्दों के लिए अलग और महिलाओं के लिए अलग।ऐसा इसलिए कि गालो समाज में मान्यता है कि जो यामी के ‘आने’ (माँ) के द्वारा बताया गया – “आने ने बताय कि मासिक धर्म होने के बाद से लड़कियों को इस कोबा से उठना निषेध है है। आमतौर पर घर के मर्द नदी और जंगलो में शिकार खेलने जाते हैं, अगर लड़की मासिक धर्म के बाद और मासिक धर्म के दौरान मर्दों वाला स्थान या चीजों का प्रयोग करती हैं तो उन मर्दों को ‘गाम्मा’ हो जाता है अर्थात् वे शिकार पाने में नाकामयाब हो जाता है। यही ‘नहीं’ वे ‘केबा’ यानी किसी मसले के लिए किए गए सभा आदि में अपना पक्ष नहीं रख पाते या बात नहीं कर पाते है”।3
उपन्यास में गालो जनजाति के विशेष कलाकृतियों और हस्तकला का उल्लेख प्रमुखता के साथ किया गया है। गालो समुदाय अपनी कलाकृति विशेष के किए पहचाना भी जाता है।बांस, बेंतो, लकड़ियों तथा पत्थरों की कलाकृतियों का प्रदर्शन और उपयोग कोई इनसे सीखें। यद्यपि अरुणाचल प्रदेश की अन्य जनजतियां भी बांस व लकड़ी से बनी वस्तुओं का उपयोग अपनी आवश्यकता अनुसार करते है क्योंकि कहा जाता है कि ‘आवश्यकता ही अविष्कार की जननी है।’
गालो जनजाति की प्रमुख कलाकृतियां और उपयोग –
“•तिर्दु (नदी, नालों से मछली पकड़ने के लिए इसका प्रयोग किया जाता है।)
- तिर्काक (स्थानीय पेय पदार्थ ‘पोका’ यानी मदिरा पीने के लिए बांस से बना प्याला)
- पिञी (बांस या लकड़ी से बना चम्मच, पोका चलाने या परोसने के काम में इसका इस्तेमाल किया जाता है)
- राजू – (मछली पकड़ने की शुण्डाकार वस्तु, महिलाओं द्वारा इसका इस्तेमाल किया जाता है)
- हिलेक – (बॉस से बना लम्बे आकार का मटका)
- पाकू – (लकड़ी या बॉस बनी थाली)
- राजू, ताकोम और इदिर (जालीनुमा टोकेरी, जलीय जीवों को पकड़ने के लिए, ताकोम और इंदिर- पुरुषों द्वारा प्रयोग की जाती है।)
गालो जनजति में बॉस का विशेष महत्व दिखाई देता है, जैसे- इगिन, आम्कुर, हीदूम या आपुम, पेसे, ओपो ओसी आदि ये सभी बॉस से बनी होती है। सभी धान को खेत से घर और फिर चूल्हे तक लाने के में प्रयोग की जाती है।
- इगिन – धान की कटाई के दौरान प्रयोग में लायी जाती है। (छोटे आकार की टोकरी)
- आम्कुर – बड़े आकार की टोकरी।
- दोसी गिनसी – यह बांस से बनी होती है, जिसका प्रयोग सिर्फ नासू से धान निकालने तथा अन्य शुभ कार्य जैसे – हूरिन-आंपिर जैसी अनुष्ठान आदि में होता है। इसका प्रयोग घर की महिलाएं करती हैं।
- रापको – चूल्हे के ऊपर लटकाए जाने वाले मचान या रैक।
- हीपार या देकी – ओखली, जो बड़े बड़े पेड़ों के तने के निचले भाग से बनाई जाती है, जो धान इत्यादि कूटने के काम आती है।
- एजि हुमनाम – महिला केंद्रित हस्तकला है। इसमें गालो स्त्रियां बॉस और लकड़ियों से बनी रुबु और ताप की मदद से सूत आदि से बेसेक या गाले (महिलाओं का लपेटकर नीचे पहननेवाली वस्त्र, जेपे–जेया (ओदने बिछानेवाला वस्त्र), शॉल, ताम्गो (पुरुषों की अचकन) आदि बुनाई का कार्य करती है। सूत की हर धागे की हर रेशे में यह स्त्रियां अपनी प्रेम और कलाकृति में निपुणता का परिचय देती है। विभिन्न रंगों के धागों में, विभिन्न प्रकार की डिजाइन रचती या बनाती हैं। गालो स्त्रियों की पहचान इन्हीं बनी हुई जैसे कोरे नामक बेसेक से होती है। गाले शब्द पादाम जनजातियों का शब्द है। गालो में इसे बेदु बेसेक कहा जाता है।4
गालो जनजाति में बांस का विशेष महत्व है। बांस और बांस से निर्मित वस्तुएं यहाँ के त्योहार, पूजा-अनुष्ठान और घर की उपयोगिता के अनुसार लगभग हर चीज में शामिल है। लेखिका कहती है – “इस प्रकार गालो जनजाति का जीवन बाँस के इर्द-गिर्द घूमता रहता है। कोई भी खान-पान और पूजा-अनुष्ठान इसके बिना अधूर है। इस प्रकार कृषक जीवन की एक श्रृंखलाबद्ध कथा हम देख सकते हैं।”5 इसके अतिरिक्त अन्य कलाकृतियों का परिचय और उपयोग के संबंध में उपन्यास में चर्चा की गयी है। साथ ही साथ माप-तौल की गणना का भी उल्लेख भी किया है। जैसे- चालीस इंगिन को और अस्सी को रोञी कहकर उसका हिसाब लगाते है।तथा जरूरत को मद्देनज़र रखते हुए आवश्यकतानुसार वस्तुओं के उपयोग का वर्णन भी किया गया है।
गालो समुदाय अपनी कलाकृति और हस्तकला के अतिरिक्त स्वादिष्ट भोज्य पदार्थों तथा उनके विशेष महत्व के लिए भी जाना जाता है। जिसका उल्लेख भी उपन्यास में मिलता है। जैसे –
- “पोका (स्थानीय पेय पदार्थ)– कोई भी कार्य बिना पोका के सम्पन्न नहीं होता ।खेतों में धान रोपने से लेकर, कटाई तक और नासू (धान का गोदाम) तक लाने में आरंभ और अंत दोनों समय पोका और आमिन-ताके बनाया जाता है।पोका (मदिरा) परोसने का भी एक तरीका होता है। पहले-पहले निकलने वाले रस अर्थात् पोका घर के बड़ों को तिर्काक में दिया जाता है।
- आमिन– चावल के छोटे-छोटे टुकडों से बनाया जाता है। इसमें मांस-मछलियाँ विशेषत: सूखे मांस-मछलियों के साथ बनाया जाता है।
- ताके – (अदरक) आमिन बनने के बाद ऊपर से मिलाया जाता है।
- आमिन-ताके गालो जनजाति के अत्यंत शुभ माने जाने वाले व्यंजन में से है। इसलिए, आत्महत्या, दुर्घटना में किसी की मौत आदि के समय यह नहीं बनाया जाता है, बल्कि महीनों-सालों तक इसे घर पर नहीं बनाया जाता है।
- रारो- जंगली पत्ते की सब्जी।
- एक्काम– ( एक खास प्रकार के बड़े पत्ते, जिसमें खाना खाया जाता है)इसके नये पत्ते या कोपले शादी में वर-वधू के आदान-प्रदान यानी ‘कोपु जिलिक नाम ‘ में काम आती है ।इसका विशेष महत्व है।
- बेलाम – जंगली बेर।”6
उपन्यास में गालो जनजाति के पूजा, अनुष्ठान, वनस्पति और प्रकृति के साथ उनके सम्बन्ध का चित्रण प्रस्तुत किया गया है।गालो जनजाति में प्रकृति की उपासना की जाती है। गालो समुदाय ही नहीं, लगभग प्रत्येक जनजातीय समुदाय प्रकृति की उपासना करते है। गालो समाज के लोग दोञी- पोलो (सूर्य व चन्द्रमा) के उपासक है। वे प्रकृति पूजा को विशेष महत्व देते हैं। दोञी अर्थात् माता (सूर्य), पोलो अर्थात् पिता (चन्द्रमा)। ‘सीसी- मदों’(पृथ्वी- आकाश) की पूजा करते है। “किसी समाज का उत्कर्ष एवं अपकर्ष धर्माश्रित है। धर्म के प्रति गालो जनजातियों की आस्था अटूट है। यह लोग प्रकृति की पूजा करते हैं। ये ‘दोषी-पोलो’ (सूर्य-चन्द्रमा) ‘सीसी-मदो’ (पृथ्वी आकाश) की पूजा करते हैं। दुष्ट या हितैषी आत्माओं को सन्तुष्ट करने के लिए वे पशु बलि देते हैं, जिसे ‘उई मोनाम’ (पिशाच पूजा) कहते हैं। ‘उई’ (अदृश्य शक्तियाँ) दुष्ट या हितैषी दोनों हो सकते हैं। गालों में ऐसी मान्यता है कि ‘उई’ की कुदृष्टि से स्वयं को बचाने के लिए पारम्परिक विधियों से उन्हें प्रसन्न रखते हैं। विभिन्न समयों पर भूत-प्रेतों की पूजा-विधियां चलती रहती है। ‘उई’ (प्रेत) तब तक आदमी को नहीं छोड़ती जब तक उन्हें उनके अनुरूप चढ़ावा नहीं चढ़ता। इस दुष्ट शक्ति या प्रेत के प्रकोप का पता ‘न्यीबो’ (पुजारी) द्वारा लगाया जाता है। इसलिए गालो समाज में ‘न्यीबो’ का विशिष्ट स्थान है। वह धर्मस्वरूप, ईश्वरीय शक्ति का प्रतिनिधि है। ‘न्यीबो’ ही दुष्टात्माओं के स्वभाव, माँग, ताकत इत्यादि का अपनी अलौकिक शक्ति ‘उई’ से वार्तालाप कर पता लगा सकता है तथा भूत-प्रेतों से छुटकारा भी दिला सकता है।”7 गालो समाज संस्कृति सम्पन्न समाज है। गालो जनजाति स्वयं को ‘आबो – तानी’(आदिमानव) का वंशज मानते हैं। गालो जनजाति की विशेष पहचान अपनी समृद्ध संस्कृति के कारण होती है। “ये लोग स्वयं को ‘आबो-तानी’ के वंशज मानते हैं। इनका यह मानना है कि ‘आबो तानी’ मानव होते हुए भी उनके पास दैविक शक्तियाँ थीं। इनका मानना है कि आदिकाल में सारा ब्रह्मांड अन्धकारमय था। उस समय धरती और आकाश का कोई अन्तर नहीं था। ‘जिमी आने’ (सृष्टिकर्ता देवी) ने धरती और आकाश को अलग किया। दिन, रात, ऋतु, पर्वत, भूमि, जल, वृक्ष, जीव-जन्तुओं की सृष्टि भी उसी जिमी ने किया। इस प्रकार यह धरती प्राणी के रहने के लायक हो गई। गालो का ऐसी सृष्टि-विषयक आख्यान है।”8 गालो जनजाति की संस्कृति को हम वहां के त्योहारों, विवाह प्रथा, विवाह संबंध, बच्चों के नामकरण, मृत्यु संबंधी विश्वास तथा संस्कार, लोक नृत्य तथा जीवन निर्वाह के विभिन्न तरीकों आदि से जान और समझ सकते है। गालो जनजाति का प्रमुख त्योहार ‘मोपिन’ है। मोपिन मानव कल्पण, अच्छी फसल तथा सुख-समृद्धि एवं एकता के लिए प्रत्येक वर्ष अप्रैल और मई महीने में मनाया जाता है। मोपित के अतिरिक्त गालो समाज में ‘मारी, ‘आम्पू’, आलो’ भी मनाते हैं। मोपिन पर्व मुख्यत: कृषि से जिरमेन जुड़ा है। यह प्रकृति सहचरी और खेत कल्याण का पर्व है, जिसे वसन्त का उल्लासमय त्योहार भी कहा जा सकता है। “मोपिन पर्व की शुरुवात प्राचीन काल में अपने सुख और वैभव के लिए ‘ताकार ताज़ी’ नामक व्याक्ति को अपने घर ‘टोगु’ (दस मिथुन बलि देने का पर्व) उत्सव मनाया जाता था। दूर-दूर के अनेक मेहमान आमंत्रित थे। पर्व में ‘आबो तानी’ (मानव पिता) को नहीं बुलाया गया था।”9 इसी लोककथा के आधार पर गालो समाज में मोपिन पर्व’ की शुरुवात मानी जाती है। इस त्योहार में बच्चें, बूढ़े, जवान सभी लोग शामिल होते हैं और सभी श्वेत वस्त्र पहनते हैं। इस त्योहार में ‘अतिथि देवो भव:’ की संस्कृति केन्द्र में है। मोपिन त्योहार का सबसे प्रमुख भाग ‘पोपीर नृत्य’ है। इस नृत्य में किसी भी प्रकार की लिंग और आयु-सीमा बाधक नहीं है। जो गालो समाज में समानता का प्रतीक है। मोपिन 4 से 5 दिन तक चलता है, जिसमें शुरू से अंत तक लोग उत्साह के साथ से एक-दूसरे के चेहरे पर ‘इती’ (पिसा हुआ श्वेत चावल) लगाते है। मोपिन के अलावा ‘आम्पिर’,‘मोद’,‘तोगु’ आदि व्यक्तिगत रूप से मनाया जाता है। यह भी परिवर के कल्याण, सुख-समृद्धि आदि के लिए मनाया जाता है।‘तोगु’ विशेषत: बेटे की शादी से जुडी पूजा होती है। इसमें मिथुन की बलि दी जाती है,‘मिथुन’ गालो समुदाय में विशेष महत्व रखता है, एक प्रकार से धार्मिक पशु है।सभी पर्वो मे पोका (मदिरा) का विशेष महत्व है। तथा साथ ही इन धार्मिक अनुष्ठानों में ‘न्यिबो’ (पुरोहित) सर्व सम्मानित व्यक्ति होते हैं।
गालो जनजाति में बच्चों के नामकरण– उपन्यास में गालो जनजाति में बच्चों के नामकरण से संबंधित तथ्य प्रस्तुत किये गए हैं। गालो समाज में एक विशेष प्रक्रिया का पालन करते हुए नामकरण सम्पन्न होता है जो अन्य जनजातियों की तुलना में बिल्कुल भिन्न है । ‘सुश्री ङाने कायी’ और ‘सुश्री गोरिक एते’ अपने लेख में लिखती है – “पितृसत्ता या वंशावली परम्परा के कारण बच्चों के नामकरण पिता के नाम की अन्तिम ध्वनि या शब्द से किया जाता है। इनकी ऐसी मान्यता है कि सारे नामकरण पिता के नाम की अन्तिम ध्वनि या शब्द से किया जाता है। इनकी ऐसी मान्यता है कि सारे मानव उत्पत्ति ‘सीसी’ (पृथ्वी) से हुई है। इसलिए ‘सीसी’ के पुत्र का नाम है ‘सिबुक’ फिर ‘सिबुक’ से ‘बुक्सिन’, ‘बुक्सिन’ से ‘सिन्तु’, ‘सिन्तु’ से ‘तुरिन’, ‘तुरिन’ से ‘रिनी’ (तानी या आँसे तानी)। ‘रिनी’ या ‘तानी’ से सारे मानव जाति का जन्म मानते हैं। गालो समुदाय के अन्दर जितने भी शामिल जातियाँ हैं, अपने वंश की गिनती ‘तानी’ या ‘आबो तानी’ से शुरू होती है। जैसे- ‘तानी’ से ‘निको’, फिर ‘निको’ से ‘कोतीक’ फिर ‘कोटिक’ से ‘तिक्जा’ फिर ‘जापो’ फिर ‘पोला’ फिर ‘लकाक’ आदि। इसी वंशावली परंपरा के कारण गालो जनजाति में पुत्र होना अनिवार्य माना जाता है। ऐसी बात नहीं है कि इस समुदाय में बेटी की आवश्यकता नहीं है, बेटी को भी पुत्र के समान स्नेह करते है। फिर भी इनकी मान्यता है कि पुत्र ही वंश को आगे बढ़ाते है। इस वंश परम्परा की खासियत है कि इसके द्वारा आप आसानी से यह पता लगा सकते हैं कि आपके अपने जाति के कोई व्यक्ति रिश्ते में आपके चाचा लगते हैं या भाई या भतीजा।”10
लेखिका उपन्यास में ग्रामीण और शहरी जीवन की तुलना यह कह कर करती है, कि ग्रामीण जीवन में शहरी जीवन कि इतनी सुख-सुविधाएँ तो नहीं है किन्तु यहाँ लोग खुश रहते है। आने (यामी की माँ) कहती है– “ तुम्हारे शहर जैसी ‘सुख-सुविधा तो नहीं पर लोग खुश रहते हैं। सबके पास खाने पीने की कोई कभी नहीं है। हम दिन भर खेतों पर काम करके थके हारे घर आते हैं। आमतौर पर लोग खा-पीकर सात बजे तक सो जाते हैं।”11 यहाँ पर शहर की तनाव भरी जिंदगी और भौतिक सुख सुविधाओं को एकत्रित करने में जीवन की व्यर्थता का चित्रण देख जा सकता है। ग्रामीण जीवन कितना सुखी और खुशहाल दिखाया गया है। हां यह ज़रूर है कि यहां मनोरंजन के साधनों का आभाव है किन्तु शादी-ब्याह, त्योहार आदि के समय मेहमानों का मनोरंजन लोकगीतों, पारम्परिक नृत्यों आदि के माध्यम से किया जाता है। दूसरा पक्ष यह भी है कि आम दिनों में ग्रामीण जीवन शैली में मनोरंजन का समय ही नहीं है क्योंकि सुबह से शाम तक लोग खेतों में काम करने जाते है और लौटकर आने के बाद इतनी थकान रहती होगी कि मनोरंजन करने का न समय है और न ही दिल करता होगा क्योंकि अगले दिन फिर उसी जीवन शैली से होकर गुजरना है। साथ ही स्त्री की स्थिति के से संबंधित विभिन्न पक्षो को उद्घाटित किया गया है। गालो समाज में स्त्री की स्थिति ठीक वैसी है जैसे एक पुरुष प्रधान या पितृसत्तात्मक समाज में होती है। स्त्री मात्र भोग की वस्तु समझी जाती है। परिवार में तथा समाज में उसे निर्णय का कोई अधिकार प्राप्त नहीं है। यामी कहती है – “स्त्रियाँ बस भोग की वस्तु है। वे घर संभालने वाली,बच्चा पैदा करने वालों, खेतों में काम करने वाली, जंगल से लकड़िया इकट्ठे करने वाली के अलावा और कुछ नहीं। पुरुष प्रधान समाज में घर का मुखिया भी मर्द, औरतों को घर के किसी भी महत्वपूर्ण कार्य में अपना निर्णय देने का हक नहीं है। पैतृक सम्पत्ति में उसका कोई अधिकार भी नहीं है। फिर भी वे खुश हैं। उन्हें अपने अधिकारों का पता ही नहीं। या यूं कहें, उन्हें कभी जरूरत ही नहीं महसूस हुई।वे पहले से ही मान बैठी है कि मर्द हर तरह से औरत से ताकतवर है और औरत कमजोर। पति जो कहता है, वो पत्थर की लकीर।”12 ‘यामी’ जो उपन्यास की प्रमुख स्त्री पात्र है उसे पितृसत्तामक समाज द्वारा बनाए गए नियमों और कानूनों का दंश झेलना पड़ता है । यामी जब अपने गांव पहुंचती है तो वहां की हालत देखकर उसको सुधारने का निर्णय करती है। यामी अपने गाँव में लोगों को शिक्षित करने में लग जाती है जिसमे कई सारी अड़चने आती है लोग अपने बच्चों खासकर बेटियों को स्कूल नहीं भेजते है क्योंकि काम में उनका हाथ कौन बटायेगा। यामी को गांव आये लगभग एक साल हो गया है वह निरंतर शिक्षा और स्वास्थ्य प्रति लोगों की जागरूक करती है और निरंतर स्कूल में बच्चों को पढ़ाती है। इसी क्रम में वह एक दिन ‘तातुम’ जो गांव के मुखिया का बिगडैल बेट तथा यामी का हमउम्र या उससे बढ़ा भी हो सकता है, जिसे यामी पढाई के संबंध में और कक्षा में शराब पीकर आने के लिए दण्ड स्वरूप मुर्गा बना देती है।जिसके चलते यामी को इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ता हैं और अगले दिन ‘लेपा लिङनाम’ के तहत यामी को स्कूल से जबरजस्ती उठवाकर उसकी शादी ‘तातुम’ से कर दी जाती है। ‘लेपा लिङनाम’ एक ऐसी प्रथा है जिसमें लड़की के मर्जी के खिलाफ उसकी शादी तय कर दी जाती है और इनकार करने पर उसके साथ पशुओं से भी बदतर व्यवहार किया जाता है। उसको जबरन पुरुष के साथ हाथ-पैर बांधकर भूखे-प्यासे बंद कर दिया जाता है, यह सिलसिला तब तक चलता है, जब तक लड़की आत्मसमर्पण न कर दे। कभी-कभी तो बलात्कार जैसे जघन्य अपराध का भी शिकार होना पड़ता है। अन्य समान में इसे ‘लाफिया’,‘लेफा’ आदि नाम से जाना जाता है। इसी मान्यता का शिकार ‘यामी’ हो जाती है जिसके बाद उसका सारा जीवन पटरी से बेपटरी हो जाता है। और इसके बाद की जिंदगी द्वंद्वों और संघर्षों से घिर जाती है। यामी अपने जीवन में होने वाले शोषण और अत्याचार को अपनी नियति समझकर परिस्थिति के साथ समझौता कर लेती है। जहाँ एक ओर यामी पितृसत्तात्मक समाज के शोषण के चलते खुद को बेबस और लाचार महसूस करती है तो दूसरी ओर इस परिस्थिति के से निकलने के लिए भी लगातार संघर्ष करती है अपनी दोनों बेटियों की पढ़ाती है और उनको ईटानागर अपनी दोस्त ‘आञा’ के पास भेज देती है। वह अपनी बेटियों को काबिल बनाना चाहती है।वह संतरे का बिजनेस करती है किन्तु ‘तातुम’ (यामी का पति) उसके ऊपर मिथ्या आरोप लगाकर उसको हमेशा की तरह पीटता है और आज इतना पीटा की ‘यामी’ हमेशा के लिए सभी की अलविदा कह देती है। बाद में वह (तातुम) इस बात का अफसोस भी करता है और पश्चाताप की अग्नि में बराबर जलता है किंतु वहीं बात है न कि समय रहते किसी बात पर ध्यान न दिया जाए तो फिर कोई मतलब नहीं। प्रसिद्ध कहावत है कि –“अब पछताए का होत जब चिड़िया चुग गयी खेत।”
गालो समाज में ‘ञिम लाबोनाम’(बहु – विवाह ) की परम्परा भी है।यह मुख्यत: वंश परम्परा से जुड़ा हुआ है गालो समाज पितृसत्तात्मक समाज है जिसमें मान्यता है कि बेटा ही वंश को आगे बढ़ा सकता है क्योंकि पैतृक सम्पति में बेटो का ही हक होता है। किन्तु अब इस प्रथा का पालन पुरुष अपनी अय्याशी के लिए करने लगे है। इसमें गलती सिर्फ पुरुषों की नहीं ये लड़किया अपने से या यों कहे कि अपने से दुगने उम्र के पुरुषों की चिकनी- चुपड़ी बातों या पैसो के लालच में फँस जाती है, तथा ख़ुद का जीवन और सामने वाले परिवार दोनों के जीवन को नरक कर देती है।
इस प्रकार उपन्यास में गालो जनजाति की प्रमुख सामाजिक मान्यताओं और संस्कृति का विवेचन प्रस्तुत किया गया है। गालो समाज से संबंधित तमाम पक्षों को उद्घाटित करते हुए गालो समाज की अच्छाइयों और बुराईयों दोनों को प्रस्तुत करता है और समान्य पाठक को गालो समाज से रूबरू कराता है।अरुणाचल जनजातीय बहुल प्रदेश है। गालो यहाँ के विशिष्ट जन-जातियों में से एक है। ये लोग बहुत मेहनती होते हैं। पर्वतीय जनजाति होने के कारण वे वन पर आश्रित है। खेती-बाड़ी, पशु-पालन, देव-पूजा तथा वन विहार पर उनके लोक-जीवन निहित हैं। ये लोग स्वावलम्बी होते हैं। रीति-रिवाज, रहन-सहन, पूजा एवं आस्था को बहुत महत्त्व देते हैं। इनकी सांस्कृतिक विरासत बहुत अनमोल एवं मनोरम है।
स्वतन्त्रता से पूर्व गालो भू-भाग आधुनिक सुविधा से कोसों दूर थी। यहाँ न विद्यालय थे और न ही सड़कें। भारत सरकार के प्रयासों से यह अब भारत के अन्य प्रदेशों से जुड़ी हुई है। और निरन्तर प्रगति की राह पर अग्रसर है। अब यहाँ विद्यालय, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय तथा सड़कें भी हैं। यहाँ तक की कृषि-पद्धति में भी सुधार तथा जागरूकता आ गई है। अब यहाँ के लोग आधुनिक तकनीक से खेती करते हैं। लोग उच्च शिक्षा पाकर देश तथा राज्य के उच्च पद में कार्यरत हैं। अब गालो लोग भी देश-दुनिया में जुड़ चुके हैं।
संदर्भ :-
- नेगी,स्नेह लता,आदिवासी समाज और साहित्य, अनुज्ञा प्रकाशन, संस्करण: प्रथम,2021,पृ.205.
- लोयी, मोर्जुम, मिनाम (उपन्यास), बोधि प्रकाशन, संस्करण:प्रथम,2020, पृ.17.
- वही, पृ.27.
- वही, पृ.10-11.
- वही, पृ.12.
- वही, पृ.10-11.
- नेगी,स्नेह लता,आदिवासी समाज और साहित्य, अनुज्ञा प्रकाशन, संस्करण: प्रथम,2021,पृ.207.
- वही, पृ.208.
- वही, पृ.208-209.
- वही, पृ.212.
- लोयी, मोर्जुम, मिनाम (उपन्यास), बोधि प्रकाशन, संस्करण:प्रथम,2020, पृ.30.
- वही, पृ.34.