आदिम सभ्यता से लेकर अब तक मानव विकास- यात्रा का इतिहास जिन कलारूपों में मिलता है, कहानी उनमें से एक प्रधान रूप है। मानव सभ्यता की इस विकास यात्रा के समान्तर कहानी यात्रा को देखें तो भारतीय कथा-साहित्य के युग संचरण को समझा जा सकता है। दुनिया का पहला कथा केन्द्र भारत ही माना जाता है। लगातार बारह शताब्दियों तक सारी दुनिया की कहानियों का स्त्रोत यहाँ मिलता है। आदिम सभ्यता से लेकर विश्व की लगभग सारी संस्कृतियों को अपने कथाबीज यहीं से मिलते रहे हैं।
पिछले कुछ दशकों की कथा-यात्रा में ओड़िआ कहानी ने कथ्य एवं शिल्प के स्तर पर कई प्रयोग किए है। इस यात्रा में प्रत्येक छोटे-बडे मोड़ को सूचित करने के लिए कहानी लेखकों, आलोचकों ने विविध नाम भी दिये है। अणु कहानी, मिनी कहानी, प्रतीक कहानी, आभास कहानी, अगली शताब्दी की कहानी जैसे कई नाम कहानी के बहुस्तरीय रूप को प्रकट करते है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद केवल ओड़िआ कहानी के क्षेत्र में ही नहीं, समूचे ओड़िआ साहित्य के क्षेत्र में जो एक जबरदस्त प्रवाह फूट पड़ा था, अपने आप में पूर्ववर्तियों की अपेक्षा बिल्कुल ही नया था। यह नयापन मात्र पाश्चात्य साहित्य के अनुकरण का फल नहीं था और न रचनात्मक स्तर पर बौद्धिक बाजीगरी का, किन्तु यह नयापन या समूचे भाव बोध का जो तत्कालीन जीवन बोध का परिणाम था। परम्परागत जीवन मूल्यों के विरोध में नये जीवन का एक ऐसा आक्रमण था, जहाँ हर पुरानी चीज अस्वीकृत की जाती है। इसलिए उस विशिष्ट संस्कृति- युग में पैदा हुए कहानी साहित्य को नई कहानी से संबोंधित करना कई दृष्टियों से युक्त लगता है।
समकालीन ओड़िआ साहित्य या कथा साहित्य को अगर समय काल में देखें तो 1960 ई. से अब तक मान सकते हैं। इस दौर में सामाजिक या जातीय जीवन की रूपरेखा कहानीकार का लक्ष्य नहीं रहा व्यक्ति जीवन के चित्र ही उसका प्रमुख लक्ष्य बन गया। बनी बनाई परिपाटी और कथा वस्तुओं को नई कहानीकार ने नकार दिया। वह अलग रास्तों में गति करता है, अज्ञात रहस्यों का उद्घाटन करता है। लोक कहानियों के जैसे राजा-रानी, बुढी असुरणी, पशु-पक्षी कथा, आदर्श हृदय परिवर्तन कथा को वह अब नहीं ढूंढता। प्रादेशिक साहित्य के साथ पाश्चात्य चिन्ताधारा से प्रभावित होकर वह इंटलेक्चुअल जीवन को अब बांधने चला। वह विभिन्न वाद, वर्ग या सूक्ष्म मन की विश्लेषण आदि पर बल देकर कहानी के कथ्य और शिल्प को परिवर्तित करता गया। जिसके परिणाम स्वरुप अनु गल्प, मिनी गल्प, प्रतीक गल्प, आभास गल्प एक आदि आंदोलन दिखने लगे। इसमें बड़े बड़े कहानीकार सुरेंद्र महान्ति, शांतनु आचार्य, मनोज दास से लेकर पाश्चात्य शैली से प्रभावित अनेक युवा कहानीकार भी शामिल होते गए। ओड़िआ कहानी की भाषा, प्रतीक, शिल्प, कथावस्तु सभी स्तर पर इसका प्रभाव पडता गया। इसे शत्रुघ्न प्रताप की बातों से समझा जा सकता है- “समकालीन समय में ओड़िआ कथा साहित्य की अनेक दिशा खुलने लगी अनेक पंख फूटने लगे। सत्तर दशक के उपरान्त कहानी में समाज के बदले व्यक्ति कहने लगा आत्मा अंतर्धान होने लगा। कहानी के शिल्प कला में भी परीक्षा निरीक्षा होकर शैली में भी बार बार परिवर्तन होता गया। इस प्रकार कहानी से कहानीपन वाले तत्वों को गायब कर कहानी को नए रूप में देखे जाने लगा।”1
उन अनेक रूपों में समकालीन कहानीकार बनी बनाई परिपाटी को खारिज करने लगा। फकीर मोहन के और परवर्ती युगों के आदर्शोन्मुख यथार्थवाद, यथार्थवाद, के बदले नवीन यथार्थ, आधुनिकतावाद, भौतिकवाद आदि दिखाई देने लगते हैं। पारिवारिक विसंगति और विखराव, बेरोजगारी, मध्यवर्गीय आकांक्षा, व्यक्ति का पलायन, शहरीकरण आदि कहानी की कथावस्तु बनने लगी। पुनः कहानी में नई चीज़ के रूप में दलित, नारी वर्ग के दुख यंत्रणा, समस्या, अधिकार, अपराध आदि के चित्र उभरने लगे। नई कहानी के साथ अ कहानी, सचेतन कहानी, सरल कहानी, सामानांतर कहानी आदि के प्रभाव ओड़िआ कथा साहित्य में भी दिखने लगे। समकालीन कहानीकार विगत अर्ध शताब्दी के परिवर्तन, राजनीतिक उलट फेर, दलित सर्वहारा वर्ग की स्थिति, व्यक्ति का अकेलापन, हताशा, सांप्रदायिकता, आतंकवाद आदि नाना प्रसंगों को अपनी कहानियों में उकेरने लगा। कूल मिलाकर समकालीन कहानी को इस प्रकार देखा जा सकता है कि इसका रूप एक नहीं बल्कि विविधतापूर्ण है। इसी प्रकार इस की कथावस्तु के भी एक नहीं अनेक रूप है। समकालीन कहानीकार इतिहास किंवदंती से लेकर नारी आदिवासी आदि विविध आयामों पर अपनी कलम चलाकर अपने आप को ढुंढता जा रहा है। जिसे इस प्रकार देखा जा सकता है-
समकालीन ओड़िआ कहानी में इतिहास और किंवदंती
इतिहास और किंवदंती को आधार बनाकर साहित्य की रचना करना एवं उस से मानवीय रस का उद्रेक करना यह आधुनिक अभिव्यक्ति की एक कला है। प्राचीन साहित्य में इतिहास और किंवदंती का महत्त्व बहुत कम था। पर आधुनिक समय में जब देश-देश के बीच युद्ध, सामाजिक-सांस्कृतिक प्रतिस्पर्धा होने लगी तब जातीय गौरव की मांग होने लगी। लोग अपने गौरवमय अतीत की चर्चा और किम्वदंतियाँ का अनुशीलन कर जातीय जीवन को पुन:स्पंदित करने लगे। साहित्य में इतिहास और किंवदंतियां जीर्ण-सीर्ण या गड़े मुर्दे उखाडने का काम नहीं करती, बल्कि उसमें उन प्राचीन चीजों को नवीन संदर्भों में पुन सृजित करना उसका काम है।
ओड़िआ कहानी में आदि परंपरा से इतिहास और किंवदंती साथ चलते आए हैं, जो समकालीन ओड़िआ कहानियों में अपने चरम विकास को प्राप्त हुए हैं। आधुनिक ओड़िआ कहानी के जन्मदाता फकीर मोहन सेनापति हैं, उन्होंने ओड़िआ की कुछ प्रारम्भिक कहानियों में इतिहास और किम्वदंतियाँ को समिश्रित किया। उनकी दो ऐतिहासिक कहानियां है ‘प्रसाद गोराप’ और ‘कमलाप्रसाद गोराप’। इन कहानियों में फकीर मोहन ने प्राचीन उत्कल की नौ वाणिज्य संस्कृति का चित्रण किया है। इसके अलावा इन कहानियों में ओड़िआ के लवण शिल्प, जहाज व्यवसाय, सामुद्रिक व्यापार, पर्तुगीज़ व्यापारियों की लुट्मार आदि देखने को मिल जाती है। उनके ‘मौना मोनी’ कहानी में नागा साधुओं की तंत्रमंत्र, लूटमार आदि धार्मिक पाखंड तथा बालेश्वर की राह जानी में तीर्थ योगियों के ऊपर अंग्रेजों का अत्याचार आदि भी इस कहानी का केंद्र रहा है। इस प्रकार आधुनिक ओड़िआ कहानी में इतिहास और किंवदंती को आधुनिक संदर्भ में वाख्या करने की परंपरा फकीरमोहन से ही शुरू हो गयी थी।
समकालीन कहानियों में इतिहास और किंवदन्तियों का महत्वपूर्ण सम्मिश्रण देखने को मिलता है। राजकिशोर राय की ‘कलिंग शिल्पी’ जो इतिहास की बात को रोमेंटिक प्रेम के साथ वर्णन करती है। गोपीनाथ महान्ती की इतिहास, पत्थर, पीछा परीक्षा, झंझावती और पुनर्जन्म आदि कहानियों में इतिहास का स्पष्ट संकेत है। बौद्ध युगीन इतिहास के साथ परवर्ती गंग-सूर्यवंशी काल की कुछ घटनाओं को केंद्र में रखकर कथाकार सुरेंद्र महान्ति कई ने कहानियाँ लिखी हैं। तथा बौद्ध युगीन छाया के पर आधारित सारीपुत्त, मधुमत्ता की रात्रि, महानिर्वाण और अंबापाली कहानी है। ‘सारीपुत्त’ में इतिहास की कुछ बातें जैसी रूपश्री के जीवन बोध और मातृत्व के चित्त वृत्ति साफ दिखाई देती है। ‘अंबापाली’ में बौद्ध थेरीगाथा यानी एक सुंदर नर्तकी के ऊपर केन्द्रीत है। नारी जीवन की व्यथा और व्यर्थता, भोग और काम, आशा और निराशा आदि द्वंदमूलक चीजों को इस कहानी में उकेरा है। वैशाली नगर की गणिका अंबापाली रूपश्री की गणभोग्या हो गई। रुपश्री और उसका एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसे राजा रूपश्री अपनाने से साफ इनकार कर देता और दासी कवलई को आदेश दिया कि इसे फेंक दो। पर कवलई उस बच्चे को छिपाकर रखती है जो आगे चलकर बुद्ध का शिष्य जीवक बनता है। जीवक चिकित्सा के भी बड़े आचार्य थे जो अंबापाली को व्याधिग्रस्त से मुक्त कर उसकी पूर्व सुंदरता लौटा देते हैं। बाद में पता चला कि यही जीबक उस का बेटा है। कुछ दिन बाद वैशाली में बुद्ध आते हैं, अंबापाली उनका दर्शन करने के लिए तड़प उठती हैं। पर वह वैश्या है मिलने के लिए कैसे से जाए? दूसरी तरफ महाराजा बिम्बिसार उसके शरीर के उपभोग के लिए कक्ष में इंतजार कर रहे हैं। वह अंतरद्वंद्व में होती है, कि एक ओर अर्थ तो दूसरी और उपभोग तो एक तरफ विलास तो दूसरी तरफ मोक्ष। इसी सोच में डूबी होती है कि गौतम बुद्ध उसके कक्ष में प्रवेश करते हैं। अंबपाली बुद्ध के चरण में लेट जाती है।
शांति महापात्र ने अनेक ऐतिहासिक कहानियाँ लिख कर ओड़िआ साहित्य को समृद्ध किया है। उनके दो कहानी संग्रह है ‘इतिहास कब्र’ और ‘विस्मृति आलेख्य’ जिसमें कई ऐतिहासिक कहानियों की भरमार है। ‘देवदासी’ कहानी में राजा तृतीया अनंग भीमदेव की कन्या चन्द्रिका के जगन्नाथ सम्मुख नृत्य, सेनापति परमार्थी देव का नृत्य उपभोग और उस पर आकर्षित हो जाना, गंगवंश की शत्रुता, शत्रु दमन के लिए परमार्थी देव की यात्रा और युद्ध में वीरगति प्राप्त। राजकुमारी चंद्रिका अनंत वासुदेव मंदिर का निर्माण और प्रतिष्ठा के दिवस के दिन प्रियतम की मृत्यु संवाद और उसी शोक में डुब जाना आदि।
गुणनिधि जेना की ‘महाकाल’ और ‘गढ़रागिरि की शेष प्रहर’ कहानी इतिहास और किम्वदंती केंन्द्रीत है। प्रथम कहानी में वस्तुकल्प बौद्ध धर्म का केंद्र और रत्नगिरी का ऐश्वर्य था। उसके पश्चात अशोक का आक्रमण, कलिंग विजय, युद्ध की विभीषिका और कलिंग युवक के स्वाभिमान और वीरत्व, कलिंग कुमारी के त्याग और अंत में अशोक का हृदय परिवर्तन आदि दिखाया गया है।
इस प्रकार समकालीन ओड़िआ कहानियों में ऐतिहासिक और किम्वदंती का सम्मिश्रण अनवरत चलता रहा है। कहीं पूरी की पूरी कहानी इतिहास और किम्वदंती मूलक है तो कहीं आंशिक रूप से उसकी झलक देखने को मिलती है।
समकालीन ओड़िआ पौराणिक और आध्यात्मिक चेतना
भले ही आधुनिक समय में मनुष्य कितने ही आगे बढ़ गया है, परन्तु अपनी परंपरा रीती नीति को कभी छोड़ नहीं पाया है। जब कभी भी उसे ये घोर आधुनिकता और उसकी चिंता घेर लेती है तब वह उसका उत्तर ढूंढने के लिए अपनी परंपरा, संस्कृति, पुराण और आध्यात्मिक चेतना की ओर डुबकी लगाता है। आधुनिक ओड़िआ कहानी में फकीर मोहन से आरंभ होकर समकालीन कहानियों में अनेक पुराण और आध्यात्मिक चिंतन के प्रसंगवद्ध हुए हैं।
समकालीन ओड़िआ कहानी में पौराणिक और आध्यात्मिक व्यंजना देखने को मिलती है। गोपीनाथ महान्ती, सुरेंद्र महान्ति, मनोज दास, नीलमणी साहू, शांतनु कुमार आचार्य चंद्रशेखर रथ, कृष्ण प्रसाद मिश्र, हेमंत कुमार दास, सत्यनारायण मिश्र, रविनारायण बराल, रवि पटनायक, रत्नाकर चौमी, सात कड़ी होता, किशोरी चरण दास, वीणापाणी महान्ति, अच्युतानंद पति, प्रतिभा राय, वामा चरण मिश्र, श्रीनिवास उद्गाता प्रमुख बहु कथा शिल्पी पौराणिक और आध्यात्मिक विषय को व्यंजनात्मक रूप में प्रकाशित कर आधुनिक जटिल जीवन को सरस करने का प्रयास करते हैं। कथाकार सुरेंद्र महान्ति जिस प्रकार पौराणिक भाव संपदा की व्यंजना की हैं, उसी प्रकार बौद्धिकता के साथ कहानी में आध्यात्मिक चेतना भी खूब समाहित है। ‘मराल की मृत्यु’ कहानी में कल्पवट पिंड को ब्रह्मांड का प्रतीक के रूप में एवं जीवात्मा और परमात्मा को दो पक्षियों के रूप में प्रस्तुत किया है जो उपनिषद से संदर्भित है उनको गंभीरता के साथ प्रस्तुत किया।
कथाकार गोपीनाथ महान्ति ने भी अपनी कुछ कहानियों में पौराणिक रसबोध को जाग्रत किया हैं। जैसे ‘जय कीचक’ कहानी में आधुनिक मनुष्य की यौन विकृतियोँ को कीचक के चरित्र के सहारे व्यक्त किये हैं। उसके बाद उनके ‘पाल भूत’ कहानी में लेखक परंपरा की पवित्रता, उसके विश्वास, मानवता आदि जड वादी मनुष्य की जिज्ञासा और आधुनिक वैज्ञानिक मनोवृत्ति प्रभावों के बीच संघर्ष को दिखाया है। समकालीन ओड़िआ कथा साहित्य में मनोज दास का विशिष्ट स्थान है। उनकी कहानियाँ मानव की संवेदना और सहानुभूति को जीवित करने का काम करती है। हृदयपरिवर्तन की कहानी ‘सीता की शादी’ में भी उनका पौराणिक-आध्यात्मिक चिंतन आधुनिक संदर्भ में स्पष्ट दिखता है। एक अपरिपक्व बालिका सीता गंभीर आंतरिकता के साथ श्री रामचन्द्र से विवाह करना चाहती है। वह अपने दादाजी से कहती है रामचन्द्र को बुलाओ मुझे उनसे शादी करनी है। तब उसके वृद्ध दादा जी कहते हैं “बुलाने की क्षमता मेरे पास नहीं है जब सीता स्वंय अपने सच्चे दिल से उन्हें पुकारेगी तो वह ज़रूर आयेंगे, क्योंकि वह बहुत दयालु है।”2 ठीक उसी प्रकार आध्यात्मिक भाव आपको कथाकार नीलमणी साहू की ‘कपोत पक्षी गुरु मोर’ कहानी में देखने को मिलता। इसमें जगन्नाथ दास रचित श्रीमद भागवत पुराण के अवधूतों की चौबीस गुरु परंपरा के बीच कपोत पक्षी प्रसंग को लिख कर पार्थिव और अपार्थिव आकर्षण के द्वंद्व को भौतिकी रूप में दिखाया हैं। उसके बाद उनकी ‘कंईच’ कहानी देखी जा सकती है। जो व्यक्तिगत स्वार्थ के चलते छोटे भाई के प्रति निर्ममता है उसको लक्ष्य कर वे रामायण की कथा को कहानी में अंशीभूत किया है-“कि यह संसार क्या है? संसार को कौन देखा है? कौन कौन समझता है?”3 यह वह लक्ष्मण का प्रश्न है जो घोर अंधकार और भीषण आंधी के समय में कुटीर में पहरा दे रहा है और इस भयंकर आंधी के समय भी लक्ष्मण के असीम धौर्य और सहनशीलता के चलते राम और सीता गंभीर सुख निद्रा में सोये हैं।
अन्य समकालीन कहानीकारों में किशोरी चरण दास आधुनिक मनुष्य के अवचेतन के अंह और रहस्य को सहज रूप में प्रकाशित करने के लिए पौराणिक कथाओं को व्यंग्यात्मक और प्रतीकात्मक रूप में व्यवहार किया है। जैसे ‘मनोहर’ कहानी में जगमोहन के माध्य्म से पूर्वजन्म में कृष्ण मृत्यु प्रसंग को मनुष्य के अंह के संदर्भ में दिखाया गया है। कि जैसे उन्होनें कौरवों के वंश को अहं के कारण निपात किया था उसी प्रकार उनके यदुवंश का भी अंह के कारण विनाश हो गया। उसके बाद उनकी ‘त्रयोबींश मृत्यु’ कहानी भी अन्य एक पौराणिक कहानी है। रविनारायण बराल भी अपनी कहानियों में पौराणिक प्रसंग का उल्लेख किया है। जैसे उनकी कहानी ‘शिखंडी की आत्मलिपि’ में लेखक खूद को शिखंडी के रूप में स्वीकार कर लिखा है- “जीवन के महाभारत युद्ध में अर्जुन विजयी और शक्तिशाली है और देवदत्त के पतन हेतु हीन शिखंडी मैं, निर्जन निश्चल अर्धरात्र में भी मुझे क्लिवत्व के अलावा और कुछ नजर नहीं आ रहा है।”4
रविनारायण बराल के जैसे कथाकार कृष्ण प्रसाद मिश्र की ‘पश्चिमा’, ‘पापा के भालू’ ‘भूत और साप’ आदि कहानियों में पूराण और किम्वदंती कथा को प्रतीकात्मक रूप में प्रकाशित किया है। ‘अभिशप्ता’ कहानी में कौशल्या के अवचेतन मन में गुप्त भावना को लेखक उद्घाटन करने के लिए उर्वशी प्रसंग का सहारा लिया है। कथाकार शांतनु आचार्य ने पौराणिक कथा वस्तुओं में विशेष रुचि नहीं लेने के पश्चात भी भारतीय संस्कृति के पौराणिक विश्वास है उसे ‘हृदय कलाप’, कहानी में उकेरा है। श्रीनिवास उदगाता की ‘मेंढक की कहानी’, बीणापाणी महांति की कहानी ‘अंधकार की छाया’, ‘नंदिघोष’ प्रभृत्ति कहानियों में और सत्यनारायण पंडा की कहानी ‘जटायु के स्वप्न’, ‘चन्द्रसेना’ आदि कहानियों में पौराणिक आध्यात्मिक चीजों को प्रतीकात्मक रूप से प्रकाशित कर मानवीय संवेदना सृष्टि करने में समर्थ हुए हैं। इस प्रकार सुरेंद्र महाँति की ‘श्रीकृष्ण का शेष धर्म’ कहानी में जहाँ महाभारत युद्ध अंत हो गया है, युद्ध क्षेत्र श्मशान बन चुका है। गांधारी अंतिम बार आंखेँ खोलकर अंतिम बार अपने पुत्र को देख लेना चाहती थी। उसने अपने आंख खोली तो सामने दुर्द्क्ष था जो जलकर भस्मीभूत हो गया। यह कृष्ण की चाल समझकर गांधारी कृष्ण को कहती एक दिन यदुवंश भी इस प्रकार विनाश हो जाएगा। इस प्रकार महाभारत की कथा पर और कुछ कहानियाँ है जैसे- ‘योजना गंज’, ‘रक्त के विलाप’ और ‘संध्यावली’।
समकालीन ओड़िआ कहानी में युद्ध विरोधी स्वर
युद्ध मनुष्य की जन्मजात प्रवृत्ति है। युद्ध उसके अहंकार और स्वार्थ की अभिव्यक्ति है। मनुष्य जीने के लिए अपने परिवेश, प्रकृति, मानव, मानवेत्तर जीव के साथ आदिम अवस्था से लड़ता आया है। प्राचीन आदिकालीन और मध्यकालीन भारतीय साहित्य तो युद्ध का साहित्य था उसमें राजाओं के युद्ध प्रशस्ति चारण और भाट कवि गाते रहते थे। परंतु आधुनिक मनुष्य ने जब दो विश्व युद्ध और उसके परिणाम देखें तब उसका हृदय काँप उठा और युद्ध के प्रति उसका नजरिया बदल गया। वह ये सोचने लगा कि कैसे युद्ध न हो या फिर युद्ध कैसे बंद हो। यही सोच उसके साहित्य में भी दिखने लगी। वेस्टलैंड जैसी कृतियां लिखी जाने लगी जिसमे मनुष्य के अस्तित्व का कितना महत्त्व है उसको आंका जाने लगा। अनंत पटनायक, मन मोहन मिश्र, राजकिशोर राय, गोपीनाथ महान्ती, सुरेंद्र महान्ति, रघुनाथ दास, मनोज दास आदि प्रमुख ओड़िआ कथाकार हैं जिन्होंने अपने समकालीन विश्व साहित्य को देखा और अपनी कहानियों में युद्ध विरोधी चिंता धारा को प्रकाशित किया।
अनंत पटनायक की कहानी ‘चंदा-उत्तरा’ युद्ध जनित बर्बरता और असहाय मनुष्य का चित्कार दिखाती है। यह कहानी स्वाधीनता पूर्ववर्ती द्वित्तीय विश्व युद्ध के समय में ब्रिटिश सैनिकों की निर्ममता और पैशाचिक प्रवृत्ति का एक जीवन्त चित्र है। रघुनाथ दास की ‘यात्रा पथे’ कहानी में द्वित्तीय विश्वयुद्ध की सूचना देखने को मिलती है। गांव के लोग कैसे हटीया हिटलर गीत गा रहे थे उस गीत में विश्वयुद्ध की गोला बारूद, बंदूक आदि के एक एक चित्र पंक्तियों में बिंबित हो रहे थे। ‘स्वराज्य’ कहानी में लेखक भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के साथ विश्व जनित निराशा और हताशा को भी रेखांकित किया है। राजकिशोर राय की कहानी ‘यात्रा मंगल’ विश्वयुद्ध परिवेश की एक करुण अभिव्यक्ति है। कथाकार गोपीनाथ महान्ती की ‘मटिया बुरुज’ में सांप्रदायिक संग्राम और युद्ध की मार्मिकता देखने को मिलती है। युद्ध के बाद की स्थिति को इस प्रकार रेखांकित किया है- “उत्कल बीर ओडिया बिदेश का मजदूर हो गया है। उसका पेट पीठ सब एक हो गए। फटेहाल मैले कपड़े और आंखें धंस गई है।”5
1962 ई. में पंचशील नीती की अवज्ञा कर चीन ने भारत पर आक्रमण किया। लद्दाख इलाके के कुछ अंश पर कब्जा कर लिया, इसी पर केंद्रित गोपीनाथ महान्ती की तीन कहानियाँ है- ‘मनुष्य’, ‘तोप’ और ‘गोली’। इस गल्पत्रयी में जातीयता का बोध है। विश्वयुद्ध के प्रति जिस घृणा और आतंक का भाव था वह भारत चीन युद्ध में चीन के प्रति भी देखा जा सकता है। इन कहानियों में युद्ध विरोधी स्वर के साथ युद्ध को प्रोत्साहन करने की तीव्रता भी देखने को मिलती। जो काम हिंदी साहित्य में रामधारी सिंह दिनकर अपनी कविताओं में कर रहे थे वही काम ओड़िआ साहित्य में गोपीनाथ महान्ति अपनी कहानियों में कर रहे थे।
सुरेंद्र महान्ति भी ‘भारत आविष्कार’ कहानी में युद्ध से उत्पन्न भय और क्षय को दिखाया गया है। प्रत्यक्ष रूप से इसमें किसी देशों के बीच युद्ध की बात तो नहीं की है, परंतु युद्ध से जो हानि होती है उसका चित्रण जरूर किया है। मनोज दास की ‘समुद्र की क्षुधा’ विश्वयुद्ध के परिपेक्ष में रचित एक मर्मस्पर्शी कहानी है। सुवर्ण रेखा नदी के बीच एक गांव था। द्वितीय विश्वयुद्ध समय में एक भयावह खबर गांव में दौड़ गयी कि अंग्रेज और जापान युद्ध कर रहे हैं और गांव में बम गिरेगा। यह सोचकर लोग भय से इधर उधर पलायन करने लगे। लोग, गांव, घर और सारे संसाधन एक पल में उजड़ गई।
कथाकार शांतनु आचार्य की ‘न्यूटन बोमा या प्रेम की दवाई’ कहानी में बंदर, गिरगिट, चिड़िया और डायनासोर के बीच युद्ध से प्रतीकात्मक रूप में हिंसा को छोड़ प्रेम और शांति का संदेश दिया है। मतलूब अली की ‘पदमा की संगीत’ भी युद्ध विरोधी भावधारा की अभिव्यक्ति है।
समकालीन ओड़िआ कहानी में नारी
ओड़िआ साहित्य में आधुनिक युग के ठीक पूर्ववर्ती युग रीतियुग में नारी को लेकर काव्य की भरमार होने लगी। पर वहाँ नारी नहीं उसकी विलासिता, कामूकता, यौवन और मनुष्य की विकृत अभिलाषा का आलंबन मात्र था। वास्तव में नारी की दशा व दिशा का चित्र आंकने का सर्वप्रथम प्रयास किया था ओड़िआ कथा साहित्य के जनक फकीरमोहन सेनापति ने। अपनी पहली कहानी ‘रेवती’ के माध्यम से उन्होंने रुढिवादी जर्जर समाज के खिलाफ रेवती को पढ़ाकर, नारी शिक्षा विरोधी परंपरा को तोड़ने का प्रयास किया था। रेवती की पढाई देख उसकी दादी कह उठती- “है लो रेवती ये पढ़ाई क्या चीज़ है और वो भी लड़कियों के लिए? जा पूजा पाठ कर, चुल्हा जला! तेरी पढाई चूल्हे में जाएगी क्या? रेवती जवाब देती है जा भाग बूढ़िया तू जा चूल्हा फूंक।”6 इस प्रकार नारी को आधुनिक समय में आधुनिक नज़रिए से देखा जाने लगा था। स्वतंत्रता के बाद समकालीन कहानियों में नारी अपने अधिकार, अस्तित्व आदि के प्रति जागरूक होकर सभी क्षेत्रों में बराबर प्रगति की झंडा लिए आगे खड़ी रहीं।
अब नारी केवल परिवार बढ़ाने के लिए या बच्चा पैदा के लिए नहीं होती। अब उसका उद्देश्य साफ है। इस पर कथाकार सुरेंद्र महान्ति ‘नीम ज्योत्स्ना’ कहानी में लिखते हैं- “वंश रक्षा जिस दिन विवाह का उद्देश्य था उस दिन गर्भधारण, सतीत्व समाज के लिए आदर्श और आवश्यक था। पर आज जन्म निरोधी समाज में वंश रक्षा की अपेक्षा आत्मरक्षा का सवाल अधिक महत्वपूर्ण है।”7 ‘सारिपुत्त’ एवं ‘अंबापाली’ कहानियों में नारी जीवन के मूलभूत सत्य को उजागर किया है। ‘सारिपुत्त’ कहानी में जीवक की माँ बुद्ध से कहती है “लौट जाओ भिक्षु मैं जीवक चाहता हूँ निर्वाण नहीं, निर्वाण तो मोह है।”8 संतान बिछुड़ जननी के हृदय की यह मार्मिक अभिव्यक्ति है।
समकालीन कहानीकारों में मनोज दास विशिष्ट है। मार्क्सवादी चिंतधारा, अरविन्द दर्शन से अनुप्राणित होने के बाद मनुष्य जीवन के बृहत्तर सत्य को अपनी कहानियों में प्रकाशित करने लगे। उन्होंने नारी के मन की बात को अपनी कहानियों में व्यक्त किया। ‘हीरा’ की कहानी में हीरा, ‘यायावर पुत्र’ कहानी में उमा रानी, ‘समुद्र क्षुधा’ में शुभ्रा, ‘वियोगात्मक’ में सुमित्रा, ‘आरण्यक’ में मिसेज चाकूडी, ‘बिल्ली’ कहानी में महेंद्र मिश्र की माँ आदि नारी पात्रो के द्वारा अपनी बात रखी है। “देह व्यवसायी हीरा कितनी रातें कितने व्यक्तियों के साथ बिताई है, पर उसके मन को कोई छू नहीं पाया। उसके नारित्व केवल निरवता में विलाप किया है।”9 सकल पापाग्नि के बीच मनोज दास ने नारी को शुद्ध स्वर्ण के रूप में अपना लिया है। फिर ‘सीता की शादी’ और ‘लक्ष्मी का अभिसार’ जैसी कुछ कहानियों में नारी जीवन के अध्यात्म जिज्ञासा की बात की है।
किशोरी चरणदास ने अपनी कहानियों में स्वतंत्रता परवर्ती समाज की अभिजात्य शिक्षित नारी चरित्र के ऊपर विशेष बल दिया। जो कि बदलते समाज के साथ अपना रुख, स्वभाव, चरित्र, आचरण सब बदल रहे थे। उन्होने अनुभव किया है कि स्त्री ही पुरुष को लालच देकर भूखा बनाती है। वह अपनी कहानी में लिखते हैं- “स्त्री खींचती है, पुरुष खींचा चला आता है” 10। किशोरी चरण नारी चरित्र की यौवन आकांक्षा को विशेष रूप से रेखांकित करते हैं। आज के रूढ़िवादी समाज के अंदर उन्होने अनुभव किया है कि- “नारी और पुरुष में नारी लाल-नीला सिल्क रस्सी में बंधे हुए मांसपिंड है। जिसमें नारी के अधिकतर अधिकार की मांग में पुरुष छिप जा रहा है। नारी ही नारी चारों ओर केवल नारी! वे ही है।”9 ये नारी वही है जो शादी करके न तो पूरी तरह अपना परिवार बसा पाती है और न ही अपने अतीत के प्रेमी को भुला पाती है। और कुछ नारियां जो कर्म की तल्लीनता की आड़ में दुर्भाग्यत: शादी न करके परवर्ती जीवन दुख और पश्चाताप से काटती। ‘टूटा हुआ खिलौना’ में गीता, ‘आइसक्रीम’ में मिसेस लाल, ‘सक्षम के अच्छे दिन’ में सावित्री, ‘लक्ष्य विहंग’ कहानी में मिसेज पूरी, ‘वन मोर’ में मिसेस सरोजा, ‘माणिहीरा’ कहानी में निर्मला देवी, ‘अंडा’ कहानी में श्यामली दत्त आदि उनकी कहानियों के नारी पात्र हैं जो वर्तमान के आधुनिक समाज की महिलाओं की दशा और दिशा को व्यक्त करती हैं।
समकालीन कथाकार अखिल मोहन पटनायक भी अपनी कहानियों में नारी जीवन के रहस्य को सुंदर रूप में अभिव्यक्त करते हैं। उनकी कहानियों के प्रमुख महिला पात्र हैं रीता, इंदिरा, निहारिका, मीना, माताजी, लीलावती, तनुजा, अहिल्या, सुमित्रा, प्रतिमा, रोना आदि। इन्हीं के माध्यम से समकालीन नारियों के चित्र को उकेरा है। वो कहते हैं आज की आभिजात्यवादी शिक्षाभिमानी नारी स्वामी को उपेक्षा कर प्रेमी के साथ रात बिताने का साहस रखती है। विवाहिता नारी निहारिका अपने प्रेमी रक्ष के साथ लिपटी हुई सोचती है- “और ये रविंद्र उसका पति पक्षहीन जटायु के जैसे है। जो कभी उसे समझ नहीं पाया, रक्ष आज रविंद्र नहीं है शांति के साथ जिओ, तुम्हीं मेरे सुंदर रविंद्र हो तुम ही मेरे मर्यादा हो।”11
शांतनु कुमार आचार्य ने भी अपनी कहानियों में नारी के अवचेतन मन को रेखांकित किया है। बारह साल की बच्ची अनीता से लेकर प्रौढ़ा एवं विवाहित नारी अमीषा के मन की बात को अपनी कहानियों में अभिव्यक्त करते हैं। समकालीन ओड़िआ कहानियों में नारी चरित्र को लेकर अनेक कथाकार अनेक रूप में कहानियाँ लिखें हैं। कोई स्त्री चरित्र के माध्यम से समाज की विकृति और जर्जर अवस्था को रेखांकित किया है तो कोई उसके जीवन के वास्तविक यथार्थ का खुलासा किया है।
समकालीन ओड़िआ कहानी में आदिवासी
ओडिया कहानी का जन्म होने से पहले ही ओड़िआ साहित्य में आदिवासियों की संवेदना को शामिल किया जाता रहा है। पर स्वतंत्रता के तीस साल पूर्व से इस विषय को विशेष बल मिला। जिसमें 1908 ई. में गोपाल वल्लभ दास रचित ‘भीमा भुआँ’ उपन्यास, उमेशचंद्र सरकार का ‘क्योंझर विद्रोह’ 1919ई. एवं 1936 ई. में भगवती चरण पाणिग्रही की दो कहानी ‘जंगल’ और ‘शिकार’ आदि है। परन्तु इन रचनाओं में वह केवल संवेदना और सहानुभूति के पात्र थे। उनका संघर्ष, वीरता, स्वतंत्र सत्ता, समाज, संस्कृति आदि के बारे में विशेष जिक्र नहीं मिलता है। परंतु स्वतंत्रता के पश्चात 1960 ई. के बाद समकालीन साहित्य में आदिवासी या जनजातियों के हर पक्ष को उकेरा जाने लगा चाहे वह आदिवासी लेखक हो चाहे गैर आदिवासी लेखक।
1983 ई. में कहानीकार सच्चिदानंद राउतराय ‘गागरी’ कहानी रचना की, जो खोंध जनजाति और उनकी नरवली प्रथा पर केंद्रित है। आदिवासी मुखिया खोंध राजा के आदेश से हर साल नरबली देते थे जिसके चलते उसे जागीर में जमीन मिली थी। पर लगातार मनुष्य हत्या से उनका जी मचल उठा। नरबली को त्याग दिया और जब राजा नहीं माने तो वह अपनी जमीन और जागिर पद लौटा दिया। इस कहानी में लेखक एक आदर्शवादी मन की बात करते हैं। भले ही व्यक्ति निम्न वर्ग का हो पर उसकी सोच और उसका व्यवहार बहुत ऊंचा है।
गोपीनाथ महान्ति आदिवासी समाज के एक वरीष्ठ कथाकार। नौकरी के दौरान वह कोरापुट के आदिवासी अंचल में दीर्घ समय तक थे। वहाँ आदिवासी के साथ घुल मिलकर बहुत अनुभव प्राप्त किया जो उनकी कहानियों में दिखता है। उन्होनें अनुभव किया है कि सभ्य समाज कैसे उन्हें अनपढ़ समझ कर शोषण करता है। अपनी कहानियों में गंड, परजा, कंध आदि आदिवासियों के संकट, समस्या, संघर्ष को जीवंत और विस्तृत रूप में रेखांकित किया है। ‘पाल भूत’, ‘विस्मृति’, ‘यज्ञ आहुति’ और ‘चींटी’ जैसी कहानियों में इसका यथार्थ परिचय मिलता है। ‘पाल भूत’ कहानी में वे आदिवासियों की जीवनधारा को कुछ इस प्रकार रेखांकित करते हैं- “सवेरे सवेरे खेती के लिए निकल पड़ते हैं ठंडी के महीने में जानवरों से फसल को बचाने के लिए वह रातभर जागते है। पर वह बाजार में बहुत कम रुपयों में खरीदा जाता है। साथ ही वह मुर्गा, बकरी बेचकर कुछ और पैसा इकट्ठे करते हैं जो महाजन के कर्ज पर न्योछावर हो जाते हैं और वह कर्ज कभी नहीं छूटता, उल्टा बढ़ता जाता है।”12 ‘विस्मृति’ कहानी में कोरापुट के परजा जनजातियों के युवक-युवती का एक जीता जागता रूप अंकित हुआ है। कैसे वह जंगल के अंदर पोडू खेती, पत्थर काटना, ठाकुर पूजन, बकरी चराना आदि सरल सहज रूप से करते हैं।
कान्हुचरण महान्ति की ‘प्राणजू’ और ‘जी हुकुम’ कहानी में जनजातियों के जीवन का सजीव चित्र प्रस्तुत किया गया है। जलंधर देव की ‘गौरी और कान्हु’ आदिवासी भुआँ संप्रदाय की प्रतिभा और स्वाभिमान का चित्र है। इस कहानी में भूआँ जाति की युवती गौरी, गौड़ जाति के युवक कान्हु से विवाह करती है। जिससे कान्हु को समाज से बाहर कर दिया गया। इस घटना का विरोध किया गौरी के भाई ने। वह कान्हु को साहस देता है कि जातिगत संकीर्णता से ऊपर उठने के लिए वह समाज के आगे झुके नहीं बल्कि संघर्ष करे। इस प्रकार आदिवासियों के यहाँ भी जाति गत संकीर्णता देखने को मिलती है।
प्राणबंधु कर की कहानी ‘हिंसा’ में आदिवासी चरित्र के स्वाभिमान का निर्देशन हुआ है। बामाचरण मित्र की ‘अपराधी’ कहानी एक भिन्न प्रकार की आदिवासी कहानी है। जहाँ कहानीकार एक विचारक के रूप में आदिवासी मनुष्य के चारित्रिक विशिष्टता को रेखांकित करते हैं। चंद्रमाधव मिश्र की कहानी ‘चंद्राहत’ भी आदिवासियों की जीवन शैली का जीता जागता रूप है। इसमें जाजपुर और कोरापुट के घोर जंगल में जाकर आदिवासियों के साथ रहना दिखाया गया है। वहाँ उनके चांगु वाद्य, युवतियों का विवाह, उन्मुक्त संगीत, नृत्य और महुआ नशा को देखकर कथावाचक का हृदय पूरित हो उठता है। सातकड़ी होता रचित ‘किरिवुर के राजा’ कहानी में आदिवासियों और खनन करने वाले मालिको के बीच संघर्ष दिखाया गया है। किरिवर पहाड़ की तल प्रदेश में आदिवासियों का निवास कितने युग से है, वहाँ के झरने का पानी, वहाँ के पेड़ो का फल मूल खा पीकर वह जीते आए हैं। अब वहाँ लोहे की खनन के लिए उस पहाड़ को तोड़ा जा रहा है। सारे आदिवासियों ने इसका विरोध किया, उनके यंत्र और मशीन को ध्वस्त कर दिया गया। इस प्रकार बड़े बड़े पूंजीपतियों, मील खदान मालिक के साथ उनकी लड़ाई अनवरत चलती रहती है। सुरेंद्र महान्ति की ‘खदान’ कहानी में भी इसप्रकार का संघर्ष उकेरा गया है। डॉक्टर कृष्ण प्रसाद मिश्रा की ‘अरण्य और उपवन’ कहानी में ये दिखाया गया है कि किस प्रकार सभ्य और शिक्षित मनुष्य अपने यौवन लालसा को बुझाने के लिए सरल और निरीह आदिवासी युवती को फंसा लेता है। शारीरिक आवश्यकता पूर्ति हो जाने के बाद उन्हें उपेक्षा कर और कहीँ चला जाता है। ‘चैती महत्ता’ कहानी में लेखक विपिन बिहारी आदिवासी संस्कृति के त्योहार पर्व को भी दिखाया है। चैती त्योहार के उपलक्ष्य में ‘परजा’ जनजाति के युवक युवतियाँ का उन्मुक्त नृत्य, उनका संगीत भोज आदि का सुंदर वर्णन किया है। की ‘नया गांव और नया ठाकुर’, ‘चंपा फूल’, ‘मिट्टी और मनुष्य’ आदि कहानियों में आदिवासियों की दैनिक जीवन की घटना, घात, प्रति घात, संघर्ष, प्रेम, बिच्छेद. अभाव, शोषण, संस्कार, कुसंस्कार, धर्म, विश्वास, पाप और पुण्य आदि की बातें उल्लेखनीय है।
उत्तम कुमार प्रधान की ‘नचिकेता के हाथ’ तथा ‘ठेलको’ कहानी में किस प्रकार सम्भ्रांत वर्ग आदिवासी छात्रों और विद्यार्थियों की योग्यता और प्रतिभा को कुचलते हैं, इसे दिखाया गया है। कॉलेज की वार्षिकी स्पोर्ट्स में आदिवासी युवक ठेलको खेल कूद में सबसे आगे रहा पर उसे आगे राज्यस्तरीय खेल और पुरस्कार से इसलिए वंचित कर दिया गया कि वह आदिवासी है। और उसी के स्थान पर डॉक्टर सुधांशु मिश्र के बच्चे को भेज दिया गया। ठेलको पढाई में भी अच्छा था, उस पर परीक्षा में नकल का झूठा आरोप लगाकर उसकी पढ़ने वाली प्रतिभा का गला घोंट दिया गया। इस प्रकार गौर पटनायक की ‘कुल्हाड़ी’, सुरेंद्र नाथ मिश्र की ‘जूलिया बहन’ जिसमें पढ़ने वाले आदिवासी समाज का किस प्रकार गला घोंट दिया जाता है। इस चीज़ का ज़िक्र किया गया है। हृषिकेश पंडा की ‘बंडा और सिसिफस’, उज्ज्वल पाढ़ी की ‘छाया आलोक के नाच’ लक्ष्मीधर सेनापति की ‘फूल रानी’, गुरूप्रसाद महान्ति की ‘रक्त मंदार’ आदि कहानियों में आदिवासी युवक-युवतियों के अंतर्द्वंद्व और मानसिकता का चित्रण किया है।
इसके अलावा विभूति पट्टनायक की ‘आँख’, ‘हाकिम बाबू’, विपिन बिहारी मिश्र की ‘यंग’ आदि में आदिवासियों को यहाँ जो मिथक, रीति-रिवाज, अंध विश्वास, परंपरा है उस पर नजर दौड़ाई गई है। कैसे जनजाति लोग बाघ को दूध पिलाने का विश्वास रखते हैं और जब उसे दूध नहीं दिया जाता है तो कैसे वह गांव पर आक्रमण करता है। इन सब का चित्र इन कहानियों में दिखता है।
इसके अलावा समकालीन ओडिआ कहानी में काम-सेक्स, उत्तर आधुनिकता, अस्तित्ववाद आदि पर भी अपनी कलम चलाकर समकालीन कहानी एक नये वेग, नयी वेश-भूषा, और नई तकनीक एवं विचारधारा के साथ आगे बढा रहे हैं। समकालीन कहानी में पुराने, नए, स्त्री, पुरुष, सभी अविराम गति से कहानी साहित्य का सृजन करते रहे है साथ ही जीवन की जटिल और व्यापक यथार्थ को सीधी और बेबाक तरिके से समकालीन कहानीकार कह देता है यही समकलीन साहित्य की खासियत है। इसमें जहाँ शिल्प की नीवनता है भाव बोध और उद्देश्य की नवीनता है, वहीं भाषागत नवीनता भी विद्यमान है। आज की कहानी बदली हुई मानसिकता की कहानी है। समकालीन कहानीकार अनुभुत सत्य के प्रति अधिक आग्रह रखता है। अनेक नारों अैर वादों से निकलकर समकालीन कहानी पुनः अपने सहज और सन्तुलित रूप को प्राप्त कर रही है। साथ ही विसंगतियों से सीधा साक्षात्कार करती हुई जीवन के भोगे हुए सत्यों को ईमानदारी व प्रखरता के साथ अभिव्यक्त करती हुई प्रगति पथ पर अग्रसर है।
संदर्भ ग्रंथ
- शत्रुघ्न पांडव- पचाश वर्षर ओड़िआ गल्प साहित्य, पृष्ठ- 164
- मनोज दास- तीसरा प्राण, पृष्ठ-194
- महापात्र नीलमणि साहु- सुमित्रा की हंसी, पृष्ठ-70
- रवि नारायण वराल- शिखंडी की आत्मलिपि, पृष्ठ-6
- प्रो.वैष्ण्व चरण सामल- ओड़िआ गल्प; उन्मेष ओ उत्तरण, पृष्ठ-224
- डॅ. नटवर सामंतराय- ओड़िआ साहित्यर इतिहास, पृष्ठ- 535
- सुरेंद्र महांति- नीम ज्योत्स्ना, पृष्ठ -9
- वही, पृष्ठ-17
- प्रो.वैष्ण्व चरण सामल- ओड़िआ गल्प; उन्मेष ओ उत्तरण, पृष्ठ-287
- किशोरि चरण दास- बच्चा रो रहा है- पृष्ठ-17
- अखिल मोहन पट्नायक- पौष की एक रात, पृष्ठ-7
- गोपिनाथ महांति- पालभूत, पृष्ठ-24
सहायक ग्रंथ-
- प्रो.वैष्ण्व चरण सामल- ओड़िआ गल्प; उन्मेष ओ उत्तरण।
- डॉ. कविता वारिक- शहे वर्षर आधुनिक ओड़िआ क्षुद्र गल्प एक तात्विक विश्लेषण।
- डॉ. नटवर सामंतराय- ओड़िआ साहित्यर इतिहास